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मंगलवार, 13 मार्च 2012

मुर्दों का दर्द


अखबार में खबर पढ़कर जाग गया

जब देखा कि एक मुर्दा चीड़घर से भाग गया

ढ़ूड़कर लाने वाले को ईनाम मिलेगा

यदि बेरोजगार हुआ तो चीड़घर में ही काम मिलेगा

प्हचान कुछ इस प्रकार लिखी थी -

उसका ब्लेक एण्ड व्हाइट

मगर दाड़ी मूंछ रंगीन है

और हेयर स्टाइल बिल्कुल नवीन है

एकदम गठीला बदन है

शरीर पर टेरीकाट का कफन है

दौड़ नहीं सकता एक टांग टूटी है

दिखाई भी कम देता है एक आंख फूटी है

ढूड़कर लाइये आप भी किस्मत आजमाइये

यह सिलसिला शाम तक चला

मगर वह मुर्दा नहीं मिला

अचानक सोचा चलो कब्रिस्तान देख लेते हैं

एक बार फिर, किस्मत का पासा फेंक लेते हैं

टार्च लेकर रात 10 बजे कब्रिस्तान आया

वहां पर रोशनी देखकर सर चकराया

बड़ा आश्चर्यजनक हाल था

सामने सजा सुन्दर पण्डाल था

बड़ी संख्या में मुर्दे विराजमान थे

कुछ मरियाल और कुछ नौजवान थे

छिपकर देखा भाषण चल रहे थे

कुछ मुर्दे आस-पास टहल रहे थे

एक ने मुझे देखा और बोला पत्रकार साहब अन्दर आइये

अपने अखबार में एक-एक बात फोटो सहित निकलवाइये

मैं घबरा रहा था, किन्तु हिम्मत बना रहा था

कागज पेन निकालकर सभा में खो गया

उनका उसी समय भाषण शुरू हो गया

सर्वप्रथम स्व0 अमरलाल जी आये

अपनी बदकिस्मती पर दो आंसू बहाये

बोले हमारा पुत्र कहता है कि पिताजी स्वर्ग में खड़े हैं

किन्तु उस नालायक को क्या पता स्वर्ग में भीड़ है

इसलिये हम वेटिंग लिस्ट में पड़े है

खैर हमारा विषय है कब्रिस्तान में बढ़ती हुई जनसंख्या

और पर्यावरण प्रदूषण -इसके कारण

और मानव द्वारा मुर्दों का शोषण

बड़ी संख्या में जनता मर रही है

हमारे आस-पास की सारी जमीन भर रही है

बम फटा तो हमारी मुसीबत हुई

सैकड़ों यहां भिजवा दिये

धर्म के नाम पर गोलियां चलीं

हजारों यहां पहुंचा दिये

कौन जाने हम मुर्दे कैसे रहते हैं

प्रदूषण और गंदगी कैसे सहते हैं

मैं प्रधानमंत्री जी को एक पत्र पहुंचाउंगा

उन्हें यहां के हालात से अवगत कराउंगा

आखिर हम मुर्दों को भी जीने का हक है

इससे तो अच्छा हमारा नरक है

कहेंगे महोदय कृप्या मरने पर अंकुश लगाइये

अन्यथा कुछ नये कब्रिस्तान बनवाइये

हमें आपसे बहुत बड़ी शिकायत है

हमारे यहां बीमार मुर्दों की बहुतायत है

जो रात भर खंासते खखारते हैं सोने नहीं देते

नहाना तो दूर हाथ तक नहीं धोते

जो बीमारी में आते हैं

हमारे बीच रोग फैलाते हैं

जो साहित्यकार आते हैं

हम सबका दिमाग चाटकर पागल बनाते हैं

आपसे अनुरोध है कि शीघ्र ही इलाज हेतु

एक डाॅक्टर मारकर पहुंचा दें

क्ृप्या हमारे कष्टों पर विचार करे

और हम मुर्दों का उद्धार करें

भविष्य में जो भी मुर्दा भिजवायें बीमार और बूढ़े नहीं

स्वस्थ और नौजवान भिजवायें

अन्यथा हम सब मिलकर

स्वर्ग का बहिस्कार कर नर्क में चलें जायेंगे

और फिर आपके पुरखे नर्कवासी कहलायें।

मैं भाषण सुनकर भाग आया

उस मुर्दे को नहीं खोज पाया

किन्तु यह समाचार आप तक पहुंचा रहा हूं

और अब स्वर्ग से सीधे नर्क में जा रहा हं।

मंगलवार, 11 अक्टूबर 2011

मोती


        मोती! बस यह शब्द कानों में पड़ते ही उस नन्हें से जीव की स्मृति ताजी हो जाती है जो कभी मुझे अपने एक दोस्त की तरह लगता था। उस समय मैं अपने पिताजी के साथ फर्रुखाबाद में रह रहा था, मेरी माँ, दादी और बहन जिला मैनपुरी के अन्तर्गत आने वाले गांव नौनेर में रह रहीं थीं। चूंकि मैं अपनी मां से दूर था, इसलिये मां का प्यार भी पिता से पाता था। उस समय मैं कक्षा चार में पढ़ रहा था, हम इस शहर में किराये के मकान में रहते थे, चूंकि हम दूसरी मंजिल पर रहते थे और छत पर हमारे सिवा और दूसरा कोई नहीं रहता था, अतः पिताजी ऑफिस जाते समय कमरे में ताला डाल देते थे, ताकि मैं कहीं खेलने चला जाऊं तो कमरा खुला न रहे और मैं अक्सर छत पर या बरामदे में बैठा रहता था।
चूंकि उस मकान में एक जामुन का पेड़ था अतः छत पर भी उसकी काफी छाया फैली रहती थी, अतः मैं ज्यादातर उसकी छाया में बैठकर पढ़ा करता। पिताजी मेरे लिये काफी सारी बाल पत्रिकायें ला देते थे, मैं ज्यादातर समय उन्हीं में उलझा रहता, मगर फिर भी कभी-कभी मेरा मन पत्रिकाओं से ऊब जाता था।
एक दिन पिताजी के साथ मैं उनके दोस्त गुप्ता जी के यहां गया। वहीं मुझे दिखा वह नन्हा सा जीव। मुझे लगा यह मेरा ऐसा दोस्त बन सकता है तो मेरे साथ रहकर मेरे अकेलेपन को दूर कर सके। वह एक सफेद चूहा था, गुप्ता जी के यहां दो चूहे पले हुये थे, उन्होंने बताया कि इनको यदि पिंजड़े से बाहर निकाल दो तब भी यह कहीं नहीं जाते। उन चूहों में से एक नाम हीरा था और दूसरे का मोती।
मैने पिताजी को अपने मन की बात बताई कि मैं इन चूहों में से एक को पालना चाहता हूँ। पिताजी पहले तो मना किया मगर मेरे जिद करने पर उन्हांेने मुझे आज्ञा दे दी, बस फिर क्या था मैं मोती नाम का एक सफेद चूहा घर ले आया। उसके लिये मैने एक पिंजरा खरीदा और विशेष रूप से पालतू सफेद चूहों के लिये बाजार में बिकने वाले छोटे-छोटे बिस्किट भी। मोती को यह बिस्किट बहुत पंसद थे।
अब तो मैं जब भी घर पर होता तो मोती को पिंजरे से निकाल कर अपने पास ही रखता और भी बिस्किट के लालच में मेरे पीछे-पीछे पूरी छत पर घूमा करता। जब मैं पढ़ने बैठता तो वह आकर मेरी किताब पर आ बैठता और तक तब न हटता जब तक उसे बिस्किट न मिलें। स्कूल जाते समय मैं मोती को पिंजरे में बंद कर देता था, और मेरे वापस आते ही मोती पिंजरे में चीं-चीं की करके बाहर निकालने को कहता। पिंजरे से बाहर निकलते ही वह मेरे आस-पास उछलकूद मचाना शुरू कर देता।
कभी-कभी ज बवह ज्यादा शरारत करता तो मैं उसे उठाकर अपनी पेंट की जेब में रख लेता और वह भी किसी बेजान वस्तु की तरह चुपचाप जेब में पड़ा रहता। अब पापा भी मोती के लिये मंूगफली, बिस्क्टि आदि अक्सर ले आते थे। सुबह के समय जब मैं सोकर जल्दी न उठता तो पिताजी मोती का पिंजरा खोल देते थे, और पिंजरे से बाहर आते ही मोती मेरे सिर से पैर तक दौड़ लगाना शुरू कर देता, मुझे तेजी से गुदगुदी होती और मजबूरन मुझे उठकर बैठना पड़ता।
एक दिन तो मोती ने हद ही कर दी। उस दिन सुबह से हल्की बारिश हो रही थी। बारिश के डर से मैने पूरा बैग ले जाने की बजाय कुछ कॉपी किताबें ही बैंक में रख लीं और स्कूल के लिये निकल गया। मगर स्कूल पहुंचकर मुझे पता चला कि गणित वाली शीला मैडम आज आ गई हैं, जबकि कल तक वह छुट्टी पर थीं। मुझे तो यही पता था कि मैडम आज नहीं आयेंगीं सो मैं गणित की कॉपी लेकर ही नहीं आया था। शीला मैडम के नाम से ही सभी बच्चे थर-थर कांपते थे। शीला मैडम आज कॉपी चेक करेंगीं और मैं तो कॉपी लाया नहीं, आज तो मेरा बैंड बजना तय है यह सोचकर मैं बेहद परेशान था। 
मैथ के पीरियड में शीला मैडम ने क्लास में प्रवेश किया। अभिवादन स्वीकार करने के बाद उन्होंने सभी छात्रों को बैठने का इशारा किया। मगर स्वयं नहीं बैठीं। हम जानते थे उनकी इस आदत को कि वह आते ही पढ़ाना शुरू कर देतीं हैं। उन्हांेने सभी छात्रों की ओर एक पैनी नजर डाली और गणित की कॉपी निकालने का आदेश दिया। मेरे चेहरे पर घबराहट के निशान साफ दिख रहे थे, शायद इसीलिये मैडम सीधी मेरी डेस्क के पास ही आकर खड़ीं हो गईं। ‘‘कॉपी क्यों नहीं निकालते?’’ मैडम ने कहा।
‘‘भूल आया मैम’’ मैने घिघियाते हुये जबाब दिया।
‘‘भूल आये! इस बैग में क्या भूसा भर रखा है?’’ मैडम ने मेरा बैग झकझोरते हुये उठाया और खोला मगर यह क्या! बैग खोलते ही मैडम एकदम स्पिंग की तरह उछलकर दूर जा खड़ीं हुईं। मेरा बैग उन्हांेने वहीं फेंक दिया।
‘‘क्या हुआ मैडम?’’ सभी छात्रों ने एक स्वर में पूछा।
मैडम के पसीना निकल आया था, गुस्से से तमतमाती हुई बोलीं, ‘‘अभी बतातीं हूं इस नालायक को, बैग में चूहे रखकर लाता है। क्या समझता है तू मैं चूहों से डरती हूँ क्या? चल यह बैग बंद करके उधर रख।‘‘ मैडम ने मुझे आज्ञा दी।
अब मेरी समझ में आया कि मैडक क्यों उछल गईं थीं। दरअसल मेरे बैंग में मोती छुप कर बैठा हुआ था। मुझे मोती की इस शरारत पर बहुत गुस्सा आया। मैडम की आज्ञा मान मैने बैग एक तरफ रख दिया।
‘‘बैंच पर खडे़ हो जाओ और हाथ ऊपर कर लो‘‘ मैडम ने मुझे सजा सुना दी। 
मैं चुपचाप बैंच पर हाथ ऊपर करके खड़ा हो गया। सभी छात्र मुुंह छुपाये हंस रहे थे। मैं नहीं जानता मेरी दशा पर या फिर मैडम के चूहे से डरने के कारण। मैं तो बस इतना जानता हूं कि मोती के चक्कर में मुझे उस दिन पूरे आधा घंटे बैंच पर खडे़ रहना पड़ा।
उस दिन मैं जैसे ही घर आया और बैग रखा मोती भागकर अपने आप पिंजड़े में जाकर बैठ गया, मैने भी आज उसे कुछ खाने को नहीं दिया और न ही मोती ने आज रोज की तरह चीं-चीं की आवाज करके खाना मांगा। शायद उसे भी अपनी भूल का अहसास हो गया था। कुछ ही दूर में मेरा गुस्सा शांत हो गया, मैने मोती को बाहर निकाला, बिस्किट खिलाये और छत पर घूमने के लिये छोड़ दिया।
मोती को मेरे घर आये एक माह हो गया था, अब मेरा समय उसके साथ बड़े मजे से कटता था। कल मम्मी भी गांव से आ गईं थीं क्यों कि पापा की तबियत कुछ गड़बड़ थी। उन्हें ठीक हुये अभी दो-चार दिन ही हुये होंगे कि एक दिन वह स्कूटर से कहीं जा रहे थे कि अचानक स्कूटर के फिसल जाने से उनके पैर में चोट लग गई, चोट ज्यादा नहीं थी सो दो-चार दिन में ठीक हो गई।
मगर न जाने क्या हो रहा था एक सप्ताह बाद ही मम्मी का पर्स कहीं खो गया, जिसमें पूरे पांच हजार रुपये थे। इस घटना के दो-तीन दिन बाद मेरी भी तबियत कुछ गड़बड़ हो गई। मेरा इलाज हुआ और मैं भी ठीक हो गया। मगर मेरी मम्मी ने अपने धार्मिक और अंधविश्वासी स्वभाव के चलते इन सब घटनाओं का कारण मोती को ठहराया और एलान कर दिया कि चूहा घर में पालना शुभ नहीं होता, अतः मोती अब यहां नहीं रहेगा।
अब भला मम्मी को कौन समझाये? मैं पापा से ही रोया गिड़गिड़ाया। पापा ने मम्मी को समझाया कि चूहा पालना अशुभ नहीं होता है, यह सब तो अंधविश्वास है। मगर मम्मी ने अपने आगे पापा की एक न सुनी और आखिर पापा ने भी कह दिया कि फुर्सत मिलते ही मोती को गुप्ता जी के यहां छोड़ आयेंगे।
अब मैं जब भी मोती की चीं-चीं सुनता अनायास ही मेरी आंखों से आंसू आ जाते। यही सोचकर कि न जाने किस दिन पापा मोती को छोड़ आयेंगे। कितनी आत्मीयता हो गई मुझे उस नन्हें से प्राणी से यह मेरे आसूं बताते थे। अब मोती भी न जाने क्या पहले जितनी शरारतें नहीं करता था। शायद उसे भी कुछ अहसास हो गया था। कल रविवार का दिन था, मुझे मालूम था कि कल पापा मोती को छोड़ने जायेंगे। शनिवार होने के कारण आज स्कूल में हाफ डे हो गया था। घर आकर मैने देखा मोती छत पर घूम रहा है, शायद स्कूल जाते वक्त मैं उसे पिंजड़े में बंद करना भूल गया था। मुझे देखकर मोती मेरे पास आ गया मैने उसके बिस्किट खिलाये और कुछ देर उसके साथ खेलता रहा। उसके बाद मैं खाना खाने चला गया, और खाना खाने के बाद छत पर बैठकर होमवर्क करने लगा, मोती वहीं छत पर इधर-उधर उछल-कूद करता रहा।
होम वर्क करने के बाद मैने मोती को बुलाया, मगर मोती नहीं मिला। कमरा, घर और पूरी छत छान मारी मगर मोती कहीं नहीं मिला। पापा के ऑफिस से आते ही मैने उन्हें भी मोती के खोने के बारे में बताया, मेरा रूंआसा चेहरा देखकर पापा के साथ-साथ मम्मी ने भी मोती को काफी देर खोजा। मगर अफसोस! मोती नहीं मिला, कभी नहीं मिला। 

बुधवार, 20 जुलाई 2011

कैसे रहें खुश?

             खुश रहने के लिये क्या आवश्यक है? पैसा! आज के युग में ज्यादातर लोग इस प्रश्न के उत्तर में यही कहेंगे। कुछ लोग प्रेम में भी खुशी तलाशते हैं। कुछ लोग ऐसे भी हैं जो कि रिश्तों में खुशी को पाना चाहते हैं। अलग-अलग लोगों की अलग-अलग विचारधारा है पर ये निश्चित है कि खुशी की तलाश सभी को है। सभी खुश रहना चाहते हैं, पर खुश रहें कैसे? यह प्रश्न हर उस व्यक्ति के सामने आता है जो जीवन की समस्याओं से दुःखी है और इनसे मुक्ति पाकर प्रसन्न रहना चाहता है, खुश रहना चाहता है। कल्पना कीजिये एक ऐसे व्यक्ति की जो हमेशा खुश रहता है, जिसके मस्तिष्क में किसी प्रकार की कोई चिन्ता नहीं है। यकीनन वह दुनियां का सबसे भाग्यशाली इंसान होगा।
हर व्यक्ति खुशी तलाशता है कोई पैसे में, कोई प्यार में पर यदि आप सोचते हैं कि ढेर सारा पैसा मिल जाने से कोई प्रसन्न रह सकता है तो यह एक भ्रम ही है। यदि पैसा खुशी दे सकता तो दुनिया के सारे अमीर लोग बहुत प्रसन्न रहते। पैसा होते हुये भी उन्हें ढेर सारी चिन्तायें घेरे रहतीं हैं, कहां रह पाते हैं वह खुश? न जाने कितना रूपया तो वह प्रसन्न रहने की कोशिष में खर्च कर देते हैं, पर याद रहे खुशी पैसे से खरीदी जाने वाली चीज नहीं है। खुशी तो हर इंसान के अंदर है बस उसे खोजने की आवश्यकता है। हाँ यदि आपको जीवन की मूलभूत आवश्यकताओं के लिये भी संघर्ष करना पड़ता है तक तो पैसा आपकी प्राथमिकता में अवश्य ही होगा।
एक शहर में एक आदमी रहता था, वह काफी अमीर था उसके घर से कुछ ही दूर एक किसान रहता था। अमीर आदमी के यहां कई नौकर-चाकर थे। हर चीज उसके पास उपलब्ध थी। फिर भी वह खुश नहीं रह पाता था। कभी व्यापार की चिन्ता, कभी बेटों की चिन्ता, कभी स्वास्थ्य की चिन्ता न जाने उस अमीर आदमी ने खुशी पाने की खातिर कितना रूपया बर्बाद किया, मगर उसे खुशी फिर भी नहीं मिली। एक बार वह अपनी कार से कहीं जाने के लिये निकला कि अचानक उसकी कार एक गांव में एक गरीब किसान के दरवाजे के सामने पहुंच कर खराब हो गई। अमीर आदमी ने अपने ड्राइवर को दूसरी कार लाने भेज दिया और तब तक स्वयं उस किसान के घास-फूस के छप्पर में जाकर बैठ गया। किसान उस समय लेटा था। उस अमीर आदमी को देखकर किसान ने उठकर उसे आदरपूर्वक घड़े का ठन्डा पानी पिलाया, पानी पीकर अमीर आदमी ने किसान से कहा, ‘‘भैया, तुम खेती छोड़कर कोई दूसरा कार्य क्यों नहीं करते, ताकि ज्यादा कमाई हो सके?‘‘
‘‘उससे क्या होगा सेठ जी?’’
‘‘क्या होगा! अरे तुम्हारे पास पैसा होगा तो तुम खुश रहोगे‘‘। सेठ जी ने कहा।
‘‘सेठ जी, क्या आप खुश हैं? आपके पास तो बहुत सारा पैसा है! सारी सुख-सुविधायें है? रही बात मेरी सो मैं तो अभी ही बहुत खुश हूँ‘‘। किसान ने नम्रता पूर्वक अमीर आदमी से कहा।
किसान की बात सुनकर अमीर आदमी चुप रह गया, किसान तो बिना पैसे के ही बहुत खुश है। यदि वह पैसे की चिन्ता शुरू कर दे तो शायद उसकी खुशी उससे दूर हो जायेगी। रह जायेगा तनाव, भागदौड़ और चिन्ता। वास्तव में प्रसन्नता तो हमारे अंदर ही है, बस उसे पहचानने की जरूरत है इसी संदर्भ में एक प्रचलित कहानी है कि एक लड़का इसलिये दुःखी था कि उसके पास जूते नहीं था, मगर उसकी सोच और दुःख उस समय एकदम खत्म हो गया जब उसने एक ऐसे लड़के को देखा जिसके पैर ही नहीं थे। कुल मिलाकर हर व्यक्ति खुश रहने की कला को अपना सकता है, चाहे वह अमीर हो अथवा गरीब। आइये खुश रहने की इस कला को हम जाने, समझें और सदा खुश रहें:-

मुस्कराते रहे:- खुश रहने की पहली सीढ़ी है कि आप हमेशा मुस्कराते रहें। मुस्कराने की यह आदत आपको आपके अंदर से बाहर ले आती है, मुस्कराने की इस कला के कारण बहुत से घाव शीघ्र भर जाते हैं। मुस्कराकर देखिये, आपकी जिन्दगी अपने आप मुस्कराने लगेगी।

नियमित व्यायाम करें:- नियमित व्यायाम व्यक्ति को आनन्ददायक अहसास से भर देता है। व्यायाम न केवल शारीरिक रूप से व्यक्ति को चुस्त-दुरुस्त रखता है बल्कि इससे मानसिक रूप से भी आदमी संतुष्ट रहता है। प्रातः थोड़ी देर के लिये कहीं हरी-भरी जगह पर टहलने निकल जाये। प्रकृति का साथ और सुबह का मनमोहक वातावरण पाकर मन खुशी से झूम उठता है।

पॉजिटिव सोचें:- मदर टेरेसा ने कहा था कि आज के समय में कोढ़ भी उतनी भयंकर बीमारी नहीं जितनी कि लोगों में अपने आपको गैर जरूरी समझने की बढ़ती सोच है। मुझे क्या? मेरी कौन सुनता है? मुझसे किसी को कोई मतलब ही नहीं‘‘। जैसे विचार आपके साथ-साथ परिवार के अन्य लोगों की खुशी में भी बाधक बनते हैं। अपने मस्तिष्क में निगेटिव विचारों को जगह न बनाने दें। हमेशा सकारात्मक सोचें। अपने लिये कुछ समय खाली बचाकर रखें, जब आप स्वयं अपने प्रभाव में आ जाते हैं तो आपको जीने का उद्देश्य प्राप्त हो जाता है और फिर आप सब-कुछ करने के लिये स्वतंत्र हो जाते हैं, खुलेपन और स्वतंत्रता का यह अहसास व्यक्ति को खुशी से भर देता है।

छोटी-छोटी चीजों में खुशी तलाशे:- अपने जीवन की उन छोटी-छोटी चीजों को पहचाने जो आपको खुशी देतीं हैं। जैसे सूरज को उगते हुये देखना, पंक्षियों की चहचहाट सुनना, सुबह-सुबह घास पर नंगे पैर चलना। इन सबके लिये जरूर वक्त निकालें क्यों कि खुशियां जीवन का हर पल प्रसन्नता से जीने पर निर्भर करतीं हैं।

खुशमिजाज लोगों से मिलें:- दरअसल जीवन में कई तरह के लोगों से वास्ता पड़ता है। कुछ लोग ऐसे भी होते हैं जो स्वयं तो कुछ नहीं ही करते हैं, और आपको भी हर कार्य के लिये आलोचनाओं से घेरे रहते हैं, इसलिये जरूरी है कि ऐसे लोगांे से मिलना जुलना हो सके तो बंद अथवा कम कर दें जो कि आपकी जिन्दगी को दुःखद बना देते हैं। केवल सकारात्मक सोच वाले लोगों को ही अपने संपर्क के दायरे में आने दें, क्यों कि ऐसे लोग दुःख के क्षणों में भी खुश रहना जानते हैं।

प्यार करें:- प्यार शब्द ही कितना मधुर है। प्यार करें से मतलब सिर्फ इतना ही नहीं है कि लड़का-लड़की ही एक दूसरे को प्यार करें। प्यार के तो कई रूप हैं, मां-बाप, भाई-बहन, दोस्तों का प्यार, पालतू जानवरों से प्यार आदि प्यार के अनेकों रूप हैं। आप जिसे प्यार करेंगे, वह भी आपको प्यार करेगा ही और इस प्रकार आपको खुशियों की अनोखी अनुभूति होगी। हां सबसे पहले अपने आप से प्यार करना कतई न भूलें।

रिश्तों में भी है खुशी:- इंसान जब-धरती पर आता है तो अकेला आता है। जैसे-जैसे वह बड़ा होता जाता है अनके रिश्ते जुड़ते चले जाते हैं। युवा होते-होते रिश्तों की एक लम्बी कतार खड़ी हो जाती है। जाने कितने रिश्ते बन जाते हैं और रिश्ते बनने का यह सिलसिला अनवरत चलता ही रहता है। जब रक्षा बंधन पर भाई बहन से मिलने आता है तो बहन खुशी से झूम उठती है, परदेश गया बेटा जब वापस आता है तो मां-बाप प्रसन्न हो जाते हैं, रिश्तों में असीमित खुशी है बस उसे महसूस करने की जरूरत है।

‘‘हर आरजू है छोटी और जिन्दगी बड़ी है।
वो सामने नजर के देखो खुशी खड़ी है।
आवाज दो बुला लो।।

बुधवार, 23 मार्च 2011

कवि महोदय


मारे शहर में एक कवि महोदय है, वैसे एक नहीं अनेक हैं। लेकिन वह अपने आप में कुछ खास ही हैं, जिनकी महिमा का गुणगान मैं यहाँ करने जा रहा हूँ। जिसे भी उनसे एक बार मिलने का सुअवसर मिलता है धन्य-धन्य हो जाता है, क्यों कि धन्य होने के सिवाय उसके पास कोई चारा ही नहीं रहता। लोग उनसे बचकर निकलते हैं, कभी-कभी कोई फंसता है, फिर भला उसे बिना कविता सुनायें कैसे जाने दें। अब चाहे आपसे उनकी भेंट बीच सड़क पर ही क्यों न हो, कवि हैं तो कविता तो सुनायेंगे ही।
वैसे मुझे शेर से नहीं, शियार से नहीं, गोली से नहीं, बारूद से नहीं मतलब दुनियाँ में डरने वाली किसी भी वस्तु या प्राणी से यानि कि चूहे और काक्रोच तक से डर नहीं लगता। लेकिन कवि नाम के जन्तु से मैं बेहद घबराता हूँ। परन्तु दुःख इस बात का है कि अक्सर इस खतरनाक जन्तु से टकराता हूँ। अभी उस दुर्घटना को भूला ही कहाँ हूँ, ख्यालों के घोड़े पर सवार मैं कहीं जा रहा था। सहसा किसी ने घोड़े को लगाम लगाई। सामने देखा तो दुनियाँ की सर्वाधिक खतरनाक प्रजाति कवि की सूरत नजर आयी। मन किया सरपट भागूँ, मगर भागता कैसे ? उस विशालकाय आकृति ने मेरा बाजू बड़े प्यार से पकड़ रखा था। खैर! कोई बात नहीं, उन्होंने मेरा हाल पूछा अब हाल क्या बताता? हाल तो उन्हें देखते ही बेहाल हो चुका था। लेकिन उन्होंने मेरे चेहरे पर उभर आयी जबरदस्ती की मुस्कराहट को देखकर स्वयं ही अंदाजा लगा लिया कि मेरा हाल अच्छा ही है। लगे हाथ बिना पूछे ही उन्होंने अपना हाल भी बता डाला। 
हाल बताते-बताते उन्हें याद आ गई अपनी एक कविता की पंक्तियां और फिर कवितागान का अनवरत सिलसिला शुरू हो गया। कुछ ही देर में वहाँ बच्चों व राह चलते लोगों की भीड़ जमा हो गयी। मै नहीं बता सकता कि वह ध्यानमग्न होकर उनकी कविता सुन रहे थे या फिर मेरी दयनीय दशा पर हँस रहे थे। कुछ राह चलते लोग हमारी ओर देखते और मुस्कराकर निकल जाते। कविता पाठ करते-करते वह बड़े ही मस्त हो गये और मेरा बाजू छोड़ दिया। मैं पिंजरे से छूटे पंछी की भाँति उड़ निकला। दूसरे दिन कुछ जानने वालों के माध्यम से पता चला कि मेरे वहाँ से भागने के दो घंटे बाद तक वह अनवरत कविता पाठ करते रहे। जब ब्रेक लिया और मुझे वहाँ नहीं पाया तो बाकी की कवितायें किसी और निरीह प्राणी की तबियत दुरूस्त करने के लिये सुरक्षित कर वहाँ से चल दिये।


पिछले वर्ष सुनने को मिला कि उन्हें एक सर्प ने डस लिया है, जहर निष्क्रिय करने का इंजेक्शन तो डॉक्टर ने लगा दिया था। मगर उसने यह भी ताकीद की थी कि मरीज को रात में सोने न दिया जाये अन्यथा खतरा हो सकता है। कवि महोदय को जगाने का इंतजाम किया ‘‘ढाक’’ (थाली, ढोलक, मंजीरा आदि बजाकर सांप का जहर उतारने की विशेष कला) बजाने वालों ने।
उन्होंने ढाक बजानी शुरू कर दी, अचानक कवि महोदय को ढाक के देशी संगीत की धुन अपनी एक कविता से मेल खाती लगी। उन्होने ने अपनी कविता ढाक के संगीत के साथ गानी प्रारम्भ कर दी। सुबह जब इस शहर के लोगों के साथ-साथ मुझे भी इस घटना बारे में पता चला तो बड़ी सावधानी पूर्वक वहाँ पहुँचा। मगर नजारा अजीब था! कवि महोदय तेज स्वर में कविता पाठ कर रहे थे और ढाक बजाने वाले छहों व्यक्ति वहीं लुढ़के पड़े थे।
कवि महोदय की शादी का किस्सा भी कम रोचक नहीं है। न जाने कितनी कोशिषें की मगर कोई लड़की कवि लड़के से शादी करने को हर्गिज तैयार न थी। जैसे-तैसे उनके माता-पिता ने उनकी शादी दूर के एक शहर से तय कर दी। शायद लड़की को पता नहीं चल पाया था कि लड़का कवि है। शादी हो गई, दुल्हन घर आ गई। कवि महोदय ने कमरे में सजी-संवरी बैठी दुल्हन का घूँघट उठाया, बरबस ही उस स्वप्न सुन्दरी की प्रशंषा में दो पंक्तियां निकल गईं।
‘‘बहुत प्यारी कविता है यह’’, लजाती, शरमाती दुल्हन ने पंक्तियों की प्रशंषा कर दी। उस बेचारी को क्या मालूम था कि ऐसा करके वह कविता रूपी बारूद के ढेर में आग लगा रही है। अपनी कविता की प्रशंषा सुन कवि महोदय अभिभूत हो गये और लगे धड़ा-धड़ एक के बाद एक कवितायें सुनाने। अब यह तो पता नहीं कि उनकी महबूबा ने कितनी देर तक इस सुनामी को सहन किया। मगर यह मालूम है कि दूसरे दिन उनके घर वालों ने उन्हें संजे-संवरे पलंग पर अकेले बैठ कविता पाठ करते पाया, कमरे का दरवाजा खुला पड़ा था, उनकी महबूबा नदारद थी। 
इस घटना से बेचारे कवि महोदय बेहद दुःखी हुये। लेकिन शहर के कुछ बुद्धिजीवियों ने उन्हें समझाया कि अब तो आप की कवितायें और भी बेहतर होंगी, क्यों कि जब तक जिंदगी में दर्द न हो तब तक आवाज और रचना में मजा नहीं आता। 
खैर कुछ भी हो लेकिन यह सच है कि राष्ट्र की इन कवि रूपी महाशक्तियों का सदुपयोग किया जा सकता है। मैं आज ही भारत सरकार को पत्र लिखकर सुझाव दूँगा कि पाकिस्तानी आतंकवादियों से निपटने का बड़ा ही आसान सा उपाय है कि देश के सारे कवियों को सीमा पर भेज दिया जाये। फिर देखें कैसे निपटते हैं आतंकवादी इन महाशक्तियों से।
              वैसे अगर आपका भी कभी इस कवि रूपी से प्राणी से सामना हुया हो तो टिप्पणी करके बतायें।

शुक्रवार, 18 मार्च 2011

सावधान ! दुनिया के सबसे खतरनाक प्राणी से)

प्रिय मित्रों, आज मैं आपको इस दुनिया के सबसे खतरनाक प्राणी से परिचित करने जा रहा हूँ. वैसे तो इन्शान ने सभी प्राणियों को अपने बस में कर रखा है, मगर इस प्राणी ने इन्शान को अपने बस में कर रखा है. यह प्राणी दुनिया के अधिकतर घरों में पाया जाता है. और "पत्नी" के नाम से जाना जाता है. प्राचीन काळ में इसे "अबला" नाम से जाना जाता था. लेकिन वर्तमान में "अ" हट चुका है, और अब जो बचा है ................वह किसी भी भले मानुष की रूह कंपा देने के लिया काफी है.
     शादी से पूर्व यह प्राणी कन्या या लड़की के नाम से जाना जाता है. और हमारे अविवाहित नवयुवक भाइयों को विशेष रूप से प्रिय होता है. कुछ भाई नासमझी में इसे अपने घर में निवास  करने का आमंत्रण (वर्तमान समय में हमारे अंग्रेजीदां भाई इसे "प्रपोज"  करना कहते हैं) दे देतें हैं. और कभी-कभी जिनकी "शनि की साढ़े साती" चल रही होती है, उनका यह आमंत्रण स्वीकार भी कर लिया जाता है. और कभी-कभी ऐसा भी होता ही की इस प्राणी को घर में लाने के लिए कई लोग मिलकर जोर लागतें है. इस घटना (दुर्घटना) को जिसे "अरेंज मैरेज"  कहतें हैं. दरअसल उनमें शामिल लोग जो स्वयम इस प्राणी के साथ रहने के आदि होते हैं, उन्हें यह बर्दास्त नहीं होता की कोई नवयुवक बिना किसी भय के अपन जीवन व्यतीत करे. अथः वह तन-मन-धन से "पत्नी" नाम के इस प्राणी की जनसंख्या बढाने में अपना योगदान प्रदान करते हैं.
 यह प्राणी देखने में सुन्दर होता है और दुनिया के सभी भागों में जहाँ भी इंशानों की बस्ती है वहां पाया जाता है. बल प्राणी की निम्न विशेसतायें हैं :-
१- यह प्राणी अन्य लोंगो को (जिससे शादी हुई है, उसके अलावा) शादी के उपरांत भी प्यारा ही लगता है, शिर्फ़ "पति" नामक ओहदे से सम्मानित पुरुष को इसके वास्तविक स्वरूप के दर्शन होते हैं.
२- यह प्राणी अन्य लोंगों को ज्यादा परेशान नहीं करना सिर्फ एक ही व्यक्ति पर आपने प्रभाव का इस्तेमाल करता हैं. जिसे समाज में "पति" के नाम से जाना जाता है.
३- हमरे देश की सरकार लोंगो को "अभियक्ति की स्वतंत्रता" प्रदान करती है. मगर यह प्राणी "पति"  से उसकः यह मौलिक अधिकार भी छीन लेता है. और इस प्राणी के घर में आते ही "पति" नमक पुरुष किसी सुन्दर कन्या से किसी भी पराकार की अभियक्ति नहीं कर सकता.
४- दुनिया के बाकि सभी प्राणी अपने मालिक की बात मानते हैं., मगर यह एक ऐसा प्राणी है जो अपने मालिक को अपनी बात मानने पर मजबूर कर देता है.
        वैसे तो मुझे भी इस प्राणी को पालने की लिए मजबूर किया जा रहा है...............मगर आप की दुआओं से मुझे अभी तक इस प्राणी से मुक्ति मिले हुई है..............अतःह मैं अभी मौलिक अधिकार "अभियक्ति की स्वतंत्रता" प्रयोग कर रहा हूँ.    
     मुझे लगता है की "पत्नी:" नमक इस प्राणी को पालने की लिए नवयुकों को विशेष प्रकार का प्रशिषण दिया जाना चाइए...........मैं जल्द ही इस तरह का एक ट्रेनिंग शिविर लगाने जा रहा हूँ. जिस भाई को ट्रेनिंग लेनी हो वह तुंरत सम्पर्क करे. .................