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मंगलवार, 14 अगस्त 2012

अपहरण


‘‘चोरी करो मगर डकैती तो मत करो, अपहरण करो तो करो मगर हत्यायें तो मत करो’’ एक माननीय मंत्री जी के भाषण को हम सभी दोस्त बड़े गौर से एक समाचार चैनल पर सुन रहे। आखिर सभी बेराजगार जो हैं और रोजगार प्राप्त करने के लिये जी तोड़ कोशिष और इंडिया मार्का जुगाड़ फिट करने के बाबजूद कोई आशा की किरण नजर नहीं आती, परिणामस्वरूप सारा समय समाचार सुनने, रोजगार समाचार देखने और नये-नये आइडिया सोचने में ही बीतता है।
मंत्री जी के भाषण ने हमारे एक साथी के मन में जबरदस्त आइडिया सुझाया, ‘‘एक आइडिया है यार’’ चहक कर उसने कहा, कहने का स्टाइल और चेहरे की चमक बता रही थी कि आइडिया जबरदस्त ही होगा।
‘‘अब कौन सा आइडिया है?’’ मैने पूछा।
‘‘देख यार नौकरी मिलती नहीं, और जीने के लिये पैसा तो चाहिये ही सो कुछ करना पड़ेगा ना, और वैसे भी हमारी पुलिस को बिना कुछ खास करे ही पैसे मिलते हीं हैं इसलिये वह कुछ करती नहीं। देखो बैंक तक लुट रहे हैं पर पुलिस कभी किसी बेचारे को पकड़ने की जहमत नहीं उठाती। तो क्यों न हम भी कुछ काम करें‘‘ हमारे साथी ने कहा।
‘‘यार साफ-साफ बोल न कहना क्या चाहता है?’’
‘‘देख हम लोग मिलकर एक ‘‘अपहरण इंडस्ट्री’’ की स्थापना करते हैं, और मंत्री ने तो कहा ही है कि अपहरण कर सकते हो बस हत्या मत करो’’।
‘‘हां यार, आइडिया तो अच्छा है, वैसे भी आजकल शहर में अमीरों की तादात बढ़ रही है, साल में पांच-छह ‘‘केस’’ भी मिल गये तो जिंदगी बिंदास कटेगी’’ हमारे एक और साथी ने भी समर्थन किया।
मुझे भी लगा बात में दम हैं, सो अपहरण इंडस्ट्री के प्रस्ताव को सर्वसम्मति से पास कर दिया गया। बस अब खोज थी तो हमारे पहले अतिथि की।
काफी सोच-विचार के बाद मुझे याद आया कि हमारे शहर के बिरजू सेठ का इकलौता लड़का बंटी ही हमारे लिये सबसे सरल और फायदेमंद शिकार हो सकता है। बिरजू सेठ का लड़का अपनी बैट्री से चलने वाली बाइक से रोज स्कूल जाता था। मैं तो उसे अच्छे से जानता था मगर हमारे साथी उसे नहीं पहचानते थे, अतः मैने उन्हें उसकी बैट्री वाली साइकिल का पूरा विवरण देकर समझा दिया। हमने अपने दिमाग के घोड़ों के साथ गधों को भी दौड़ाया और इस नतीजे पर पहुंचे कि यदि बंटी का अपहरण सफलतापूवर्क होता है तो हमारी अपरहण इंडस्ट्री की धमाकेदार शुरूआत होगी और कम से एक करोड़ की वसूली तो आसानी से हो ही जायेगी।
बस फिर क्या था, हमने आनन-फानन में अपनी योजना अपने वफदार तेज-तर्रार सार्थियों को समझा दी। हमारे साथियों ने अपने प्लान पर तेजी से अमल किया और उसी दिन स्कूल से वापस आते समय बंटी का अपहरण कर लिया। हमने अपने साथियों के माध्यम से बंटी के घर एक ‘‘आडियो केसेट‘‘ में यह संदेश रिकार्ड करके भिजवा दिया कि यदि अपने लड़के को जीवित वापस चाहते हो तो एक करोड़ रूपया एक सप्ताह के अंदर हमारे दिये गये ठिकाने पर पहंुचा दो। हमने अपने ठिकाने का पूरा विवरण और वहां पहुंचने वाले आदमी के बारे में पूरा विवरण भी कैसेट में रिकार्ड करवा दिया था। हमें पूरा विश्वास था कि हमारी योजना के अनुसार अपने इकलौते बेटे को बचाने के लिये बिरजू सेठ हमें बड़ी आसानी से एक करोड़ रुपये दे देगा।
निश्चित तारीख को नियत किये गये ठिकाने पर हमने अपने सबसे विश्वसनीय साथी को भेज दिया। लगभग एक घंटे बाद वह खाली हाथ लौट आया, हां उसके हाथ में एक लिफाफा जरूर था। हमने मन ही मन सोचा कि शायद बिरजू सेठ ने हमें बेयरर चेक से भुगतान किया है।
‘‘भाई वहां बिरजू सेठ तो नहीं आया, कोई आदमी यह लिफाफा दे गया है’’ साथी ने लिफाफा मेरी ओर बढ़ाते हुये कहा।
मैने लिफाफा लेकर खोला तो उसमें एक पत्र निकला, मैने उसे पढ़ना शुरू किया,
‘‘प्रिय भाई,
सदर नमस्कार।
आपको बहुत-बहुत धन्यवाद, जो आपने मेरे लड़के का अपहरण कर लिया। मगर मुझे शिकायत इस बात की है कि आपने मेरे एक ही लड़के का अपहरण क्यों किया। कृपा करके कम से कम मेरे दो और लड़कों का अपहरण कर ले जायें और हां, और आपने कहा कि मैं लड़का वापस पाने के लिये आपको एक करोड़ रुपये दूं, तो इस बारे में कान-नाक खोलकर सुन लीजिये कि मैं आपको एक करोड़ तो क्या एक कौड़ी भी नहीं दूंगा और हां यदि आपने मेरे लड़के को वापस करने की कोशिष की तो राधे कसम पुलिस में शिकायत जरूर कर दूंगा।
अतः आपकी भलाई इसी में है कि उस लड़के को तो अपने पास रखो ही कम से कम दो लड़कों को और पकड़ ले जाओ, क्यों मैं अपने एक दर्जन लड़कों की इस फौज को खिलाने पिलाने में असमर्थ हूं। एक लड़के को अपने पास रखने के लिये बहुत-बहुत धन्यवाद, कृप्या भूलकर भी उसे वापस भेजने की हिम्मत मत करना वर्ना मैं पुलिस में रिर्पोट कर दूंगा।
आपका विश्वसनीय
   छेनू लाला उर्फ जलेबी वाला  
‘‘अबे गधों किसके लड़के का अपहरण करके लाये हो तुम लोग?’’ पत्र पढ़कर मैं चीखा।
‘‘अरे आपने जिसका बताया था उसीका तो अपहरण किया है हमने, यह देखिये हम तो साइकिल भी साथ लाये थे‘’।
‘‘फिर यह छेनू लाला-जलेबी वाला कौन है?’’
‘‘यह तो हमंे खुद नहीं पता’’।
हम सभी बुरी तरह झंुझला रहे थे, तभी हमारे एक साथी ने कमरे में प्रवेश किया और कहा, ‘‘मर गये यार, उस दिन बिरजू सेठ ने स्कूल से वापस आते समय अपनी साइकिल अपने दोस्त यानी कि छेनू लाला के बेटे को दे दी थी, और उसके बेटे का नाम भी बंटी ही है।‘‘ उसने रहस्योद्घाटन किया।
हमने अपना सर पीट लिया। इधर वह लड़का हमारी नाक में दम किये था। अपने घर जाने के लिये तो उसने एक बार भी नहीं कहा, हां कभी हमसे रसगुल्ले मांगता, कभी जलेबी तो कभी चाॅकलेट। न दो तो बुरी तरह चीख-चीख कर रोने लगता। वह तो हमसे ऐसे जिद करता मानो हम ही उसके बाप हों। अब हम सब के सब परेशान थे। एक तो बेरोजगारी ऊपर से इस मुसीबत का खर्च। दोष तो बेचारे साथियों का भी नहीं था, उन्होंने तो साइकिल की पहचान और लड़के का नाम सब मिला लिया था, पर हमारा नसीब ही खराब था सो सब काम खराब हो गया और जब कैसेट भेजा तो वह भी पता नहीं कैसे छेनू लाला को मिल गया।
खैर! जो हुआ सो हुआ। मगर अब समस्या यह थी कि उस लड़के को वापस करने पर छेनू लाला पुलिस को सूचना देने की धमकी दी थी। इधर उस लड़के को खिलाते-खिलाते हमारी हालत पतली हो रही थी। जितना हम सब मिलकर खाते थो उतना वह अकेले खा जाता था। उससे बुरी तरह परेशान हो हमने उसे उसके बाप के घर  छोड़ आने का निश्चय कर लिया। मगर वह लड़का अपने घर जाने को तैयार ही नहीं था।
जैसे-तैसे एक प्लान सोचा और उससे कहा कि चल बेटा तुझे बाहर घुमाने ले चलते हैं। खुशी-खुशी वह हमारे साथ घूमने के लिये निकल पड़ा। हमने उसके घर के जनदीक पहुंचकर हमने उसे आइसक्रीम दिलवायी, चाॅकलेट भी दिलवाई। वह मस्त होकर आइसक्रीम खाने लगा और हम अच्छा मौका देख उसे वहीं छोड़ सरपट भागने लगे। मगर किस्मत! उसने हमें भागते हुये देख लिया। आइसक्रीम फेंक उसने भी हमारे पीछे भागना प्रारम्भ कर दिया। वह तेजी से अंकल-अंकल चिल्लाता जा रहा था, और भागता जा रहा था। उसे भागते देख हमारी गति स्वतः ही दोगुनी हो गई।
बड़ी मुश्किल से उस लड़के से पीछा छुड़ाकर हम वापस आये। कान पकड़कर बैठकें लगायीं, नाक पकड़कर खींची और इसी के साथ हमारा ‘‘अपहरण इंडस्ट्री’’ का धंधा शुरू होने से पहले ही बंद हो गया। मगर बेरोजगार हैं सो कुछ ना कुछ आइडिया सोचना तो पड़ता ही है, अगर आपके पास कोई आइडिया हो तो जरूर बताना, मगर अक्ल के घोड़े ही दौड़ाना, गधों को कसकर बांध देना ताकि घोड़ों के साथ वह भी न दौड़ पड़ें।

मंगलवार, 13 मार्च 2012

मुर्दों का दर्द


अखबार में खबर पढ़कर जाग गया

जब देखा कि एक मुर्दा चीड़घर से भाग गया

ढ़ूड़कर लाने वाले को ईनाम मिलेगा

यदि बेरोजगार हुआ तो चीड़घर में ही काम मिलेगा

प्हचान कुछ इस प्रकार लिखी थी -

उसका ब्लेक एण्ड व्हाइट

मगर दाड़ी मूंछ रंगीन है

और हेयर स्टाइल बिल्कुल नवीन है

एकदम गठीला बदन है

शरीर पर टेरीकाट का कफन है

दौड़ नहीं सकता एक टांग टूटी है

दिखाई भी कम देता है एक आंख फूटी है

ढूड़कर लाइये आप भी किस्मत आजमाइये

यह सिलसिला शाम तक चला

मगर वह मुर्दा नहीं मिला

अचानक सोचा चलो कब्रिस्तान देख लेते हैं

एक बार फिर, किस्मत का पासा फेंक लेते हैं

टार्च लेकर रात 10 बजे कब्रिस्तान आया

वहां पर रोशनी देखकर सर चकराया

बड़ा आश्चर्यजनक हाल था

सामने सजा सुन्दर पण्डाल था

बड़ी संख्या में मुर्दे विराजमान थे

कुछ मरियाल और कुछ नौजवान थे

छिपकर देखा भाषण चल रहे थे

कुछ मुर्दे आस-पास टहल रहे थे

एक ने मुझे देखा और बोला पत्रकार साहब अन्दर आइये

अपने अखबार में एक-एक बात फोटो सहित निकलवाइये

मैं घबरा रहा था, किन्तु हिम्मत बना रहा था

कागज पेन निकालकर सभा में खो गया

उनका उसी समय भाषण शुरू हो गया

सर्वप्रथम स्व0 अमरलाल जी आये

अपनी बदकिस्मती पर दो आंसू बहाये

बोले हमारा पुत्र कहता है कि पिताजी स्वर्ग में खड़े हैं

किन्तु उस नालायक को क्या पता स्वर्ग में भीड़ है

इसलिये हम वेटिंग लिस्ट में पड़े है

खैर हमारा विषय है कब्रिस्तान में बढ़ती हुई जनसंख्या

और पर्यावरण प्रदूषण -इसके कारण

और मानव द्वारा मुर्दों का शोषण

बड़ी संख्या में जनता मर रही है

हमारे आस-पास की सारी जमीन भर रही है

बम फटा तो हमारी मुसीबत हुई

सैकड़ों यहां भिजवा दिये

धर्म के नाम पर गोलियां चलीं

हजारों यहां पहुंचा दिये

कौन जाने हम मुर्दे कैसे रहते हैं

प्रदूषण और गंदगी कैसे सहते हैं

मैं प्रधानमंत्री जी को एक पत्र पहुंचाउंगा

उन्हें यहां के हालात से अवगत कराउंगा

आखिर हम मुर्दों को भी जीने का हक है

इससे तो अच्छा हमारा नरक है

कहेंगे महोदय कृप्या मरने पर अंकुश लगाइये

अन्यथा कुछ नये कब्रिस्तान बनवाइये

हमें आपसे बहुत बड़ी शिकायत है

हमारे यहां बीमार मुर्दों की बहुतायत है

जो रात भर खंासते खखारते हैं सोने नहीं देते

नहाना तो दूर हाथ तक नहीं धोते

जो बीमारी में आते हैं

हमारे बीच रोग फैलाते हैं

जो साहित्यकार आते हैं

हम सबका दिमाग चाटकर पागल बनाते हैं

आपसे अनुरोध है कि शीघ्र ही इलाज हेतु

एक डाॅक्टर मारकर पहुंचा दें

क्ृप्या हमारे कष्टों पर विचार करे

और हम मुर्दों का उद्धार करें

भविष्य में जो भी मुर्दा भिजवायें बीमार और बूढ़े नहीं

स्वस्थ और नौजवान भिजवायें

अन्यथा हम सब मिलकर

स्वर्ग का बहिस्कार कर नर्क में चलें जायेंगे

और फिर आपके पुरखे नर्कवासी कहलायें।

मैं भाषण सुनकर भाग आया

उस मुर्दे को नहीं खोज पाया

किन्तु यह समाचार आप तक पहुंचा रहा हूं

और अब स्वर्ग से सीधे नर्क में जा रहा हं।

बुधवार, 23 मार्च 2011

कवि महोदय


मारे शहर में एक कवि महोदय है, वैसे एक नहीं अनेक हैं। लेकिन वह अपने आप में कुछ खास ही हैं, जिनकी महिमा का गुणगान मैं यहाँ करने जा रहा हूँ। जिसे भी उनसे एक बार मिलने का सुअवसर मिलता है धन्य-धन्य हो जाता है, क्यों कि धन्य होने के सिवाय उसके पास कोई चारा ही नहीं रहता। लोग उनसे बचकर निकलते हैं, कभी-कभी कोई फंसता है, फिर भला उसे बिना कविता सुनायें कैसे जाने दें। अब चाहे आपसे उनकी भेंट बीच सड़क पर ही क्यों न हो, कवि हैं तो कविता तो सुनायेंगे ही।
वैसे मुझे शेर से नहीं, शियार से नहीं, गोली से नहीं, बारूद से नहीं मतलब दुनियाँ में डरने वाली किसी भी वस्तु या प्राणी से यानि कि चूहे और काक्रोच तक से डर नहीं लगता। लेकिन कवि नाम के जन्तु से मैं बेहद घबराता हूँ। परन्तु दुःख इस बात का है कि अक्सर इस खतरनाक जन्तु से टकराता हूँ। अभी उस दुर्घटना को भूला ही कहाँ हूँ, ख्यालों के घोड़े पर सवार मैं कहीं जा रहा था। सहसा किसी ने घोड़े को लगाम लगाई। सामने देखा तो दुनियाँ की सर्वाधिक खतरनाक प्रजाति कवि की सूरत नजर आयी। मन किया सरपट भागूँ, मगर भागता कैसे ? उस विशालकाय आकृति ने मेरा बाजू बड़े प्यार से पकड़ रखा था। खैर! कोई बात नहीं, उन्होंने मेरा हाल पूछा अब हाल क्या बताता? हाल तो उन्हें देखते ही बेहाल हो चुका था। लेकिन उन्होंने मेरे चेहरे पर उभर आयी जबरदस्ती की मुस्कराहट को देखकर स्वयं ही अंदाजा लगा लिया कि मेरा हाल अच्छा ही है। लगे हाथ बिना पूछे ही उन्होंने अपना हाल भी बता डाला। 
हाल बताते-बताते उन्हें याद आ गई अपनी एक कविता की पंक्तियां और फिर कवितागान का अनवरत सिलसिला शुरू हो गया। कुछ ही देर में वहाँ बच्चों व राह चलते लोगों की भीड़ जमा हो गयी। मै नहीं बता सकता कि वह ध्यानमग्न होकर उनकी कविता सुन रहे थे या फिर मेरी दयनीय दशा पर हँस रहे थे। कुछ राह चलते लोग हमारी ओर देखते और मुस्कराकर निकल जाते। कविता पाठ करते-करते वह बड़े ही मस्त हो गये और मेरा बाजू छोड़ दिया। मैं पिंजरे से छूटे पंछी की भाँति उड़ निकला। दूसरे दिन कुछ जानने वालों के माध्यम से पता चला कि मेरे वहाँ से भागने के दो घंटे बाद तक वह अनवरत कविता पाठ करते रहे। जब ब्रेक लिया और मुझे वहाँ नहीं पाया तो बाकी की कवितायें किसी और निरीह प्राणी की तबियत दुरूस्त करने के लिये सुरक्षित कर वहाँ से चल दिये।


पिछले वर्ष सुनने को मिला कि उन्हें एक सर्प ने डस लिया है, जहर निष्क्रिय करने का इंजेक्शन तो डॉक्टर ने लगा दिया था। मगर उसने यह भी ताकीद की थी कि मरीज को रात में सोने न दिया जाये अन्यथा खतरा हो सकता है। कवि महोदय को जगाने का इंतजाम किया ‘‘ढाक’’ (थाली, ढोलक, मंजीरा आदि बजाकर सांप का जहर उतारने की विशेष कला) बजाने वालों ने।
उन्होंने ढाक बजानी शुरू कर दी, अचानक कवि महोदय को ढाक के देशी संगीत की धुन अपनी एक कविता से मेल खाती लगी। उन्होने ने अपनी कविता ढाक के संगीत के साथ गानी प्रारम्भ कर दी। सुबह जब इस शहर के लोगों के साथ-साथ मुझे भी इस घटना बारे में पता चला तो बड़ी सावधानी पूर्वक वहाँ पहुँचा। मगर नजारा अजीब था! कवि महोदय तेज स्वर में कविता पाठ कर रहे थे और ढाक बजाने वाले छहों व्यक्ति वहीं लुढ़के पड़े थे।
कवि महोदय की शादी का किस्सा भी कम रोचक नहीं है। न जाने कितनी कोशिषें की मगर कोई लड़की कवि लड़के से शादी करने को हर्गिज तैयार न थी। जैसे-तैसे उनके माता-पिता ने उनकी शादी दूर के एक शहर से तय कर दी। शायद लड़की को पता नहीं चल पाया था कि लड़का कवि है। शादी हो गई, दुल्हन घर आ गई। कवि महोदय ने कमरे में सजी-संवरी बैठी दुल्हन का घूँघट उठाया, बरबस ही उस स्वप्न सुन्दरी की प्रशंषा में दो पंक्तियां निकल गईं।
‘‘बहुत प्यारी कविता है यह’’, लजाती, शरमाती दुल्हन ने पंक्तियों की प्रशंषा कर दी। उस बेचारी को क्या मालूम था कि ऐसा करके वह कविता रूपी बारूद के ढेर में आग लगा रही है। अपनी कविता की प्रशंषा सुन कवि महोदय अभिभूत हो गये और लगे धड़ा-धड़ एक के बाद एक कवितायें सुनाने। अब यह तो पता नहीं कि उनकी महबूबा ने कितनी देर तक इस सुनामी को सहन किया। मगर यह मालूम है कि दूसरे दिन उनके घर वालों ने उन्हें संजे-संवरे पलंग पर अकेले बैठ कविता पाठ करते पाया, कमरे का दरवाजा खुला पड़ा था, उनकी महबूबा नदारद थी। 
इस घटना से बेचारे कवि महोदय बेहद दुःखी हुये। लेकिन शहर के कुछ बुद्धिजीवियों ने उन्हें समझाया कि अब तो आप की कवितायें और भी बेहतर होंगी, क्यों कि जब तक जिंदगी में दर्द न हो तब तक आवाज और रचना में मजा नहीं आता। 
खैर कुछ भी हो लेकिन यह सच है कि राष्ट्र की इन कवि रूपी महाशक्तियों का सदुपयोग किया जा सकता है। मैं आज ही भारत सरकार को पत्र लिखकर सुझाव दूँगा कि पाकिस्तानी आतंकवादियों से निपटने का बड़ा ही आसान सा उपाय है कि देश के सारे कवियों को सीमा पर भेज दिया जाये। फिर देखें कैसे निपटते हैं आतंकवादी इन महाशक्तियों से।
              वैसे अगर आपका भी कभी इस कवि रूपी से प्राणी से सामना हुया हो तो टिप्पणी करके बतायें।

शुक्रवार, 18 मार्च 2011

सावधान ! दुनिया के सबसे खतरनाक प्राणी से)

प्रिय मित्रों, आज मैं आपको इस दुनिया के सबसे खतरनाक प्राणी से परिचित करने जा रहा हूँ. वैसे तो इन्शान ने सभी प्राणियों को अपने बस में कर रखा है, मगर इस प्राणी ने इन्शान को अपने बस में कर रखा है. यह प्राणी दुनिया के अधिकतर घरों में पाया जाता है. और "पत्नी" के नाम से जाना जाता है. प्राचीन काळ में इसे "अबला" नाम से जाना जाता था. लेकिन वर्तमान में "अ" हट चुका है, और अब जो बचा है ................वह किसी भी भले मानुष की रूह कंपा देने के लिया काफी है.
     शादी से पूर्व यह प्राणी कन्या या लड़की के नाम से जाना जाता है. और हमारे अविवाहित नवयुवक भाइयों को विशेष रूप से प्रिय होता है. कुछ भाई नासमझी में इसे अपने घर में निवास  करने का आमंत्रण (वर्तमान समय में हमारे अंग्रेजीदां भाई इसे "प्रपोज"  करना कहते हैं) दे देतें हैं. और कभी-कभी जिनकी "शनि की साढ़े साती" चल रही होती है, उनका यह आमंत्रण स्वीकार भी कर लिया जाता है. और कभी-कभी ऐसा भी होता ही की इस प्राणी को घर में लाने के लिए कई लोग मिलकर जोर लागतें है. इस घटना (दुर्घटना) को जिसे "अरेंज मैरेज"  कहतें हैं. दरअसल उनमें शामिल लोग जो स्वयम इस प्राणी के साथ रहने के आदि होते हैं, उन्हें यह बर्दास्त नहीं होता की कोई नवयुवक बिना किसी भय के अपन जीवन व्यतीत करे. अथः वह तन-मन-धन से "पत्नी" नाम के इस प्राणी की जनसंख्या बढाने में अपना योगदान प्रदान करते हैं.
 यह प्राणी देखने में सुन्दर होता है और दुनिया के सभी भागों में जहाँ भी इंशानों की बस्ती है वहां पाया जाता है. बल प्राणी की निम्न विशेसतायें हैं :-
१- यह प्राणी अन्य लोंगो को (जिससे शादी हुई है, उसके अलावा) शादी के उपरांत भी प्यारा ही लगता है, शिर्फ़ "पति" नामक ओहदे से सम्मानित पुरुष को इसके वास्तविक स्वरूप के दर्शन होते हैं.
२- यह प्राणी अन्य लोंगों को ज्यादा परेशान नहीं करना सिर्फ एक ही व्यक्ति पर आपने प्रभाव का इस्तेमाल करता हैं. जिसे समाज में "पति" के नाम से जाना जाता है.
३- हमरे देश की सरकार लोंगो को "अभियक्ति की स्वतंत्रता" प्रदान करती है. मगर यह प्राणी "पति"  से उसकः यह मौलिक अधिकार भी छीन लेता है. और इस प्राणी के घर में आते ही "पति" नमक पुरुष किसी सुन्दर कन्या से किसी भी पराकार की अभियक्ति नहीं कर सकता.
४- दुनिया के बाकि सभी प्राणी अपने मालिक की बात मानते हैं., मगर यह एक ऐसा प्राणी है जो अपने मालिक को अपनी बात मानने पर मजबूर कर देता है.
        वैसे तो मुझे भी इस प्राणी को पालने की लिए मजबूर किया जा रहा है...............मगर आप की दुआओं से मुझे अभी तक इस प्राणी से मुक्ति मिले हुई है..............अतःह मैं अभी मौलिक अधिकार "अभियक्ति की स्वतंत्रता" प्रयोग कर रहा हूँ.    
     मुझे लगता है की "पत्नी:" नमक इस प्राणी को पालने की लिए नवयुकों को विशेष प्रकार का प्रशिषण दिया जाना चाइए...........मैं जल्द ही इस तरह का एक ट्रेनिंग शिविर लगाने जा रहा हूँ. जिस भाई को ट्रेनिंग लेनी हो वह तुंरत सम्पर्क करे. .................