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रविवार, 6 अक्टूबर 2013

कभी देश और देशवासियों की स्थिति भी देख लीजिये नेताजी!!

          समाजवादी पार्टी के मुखिया मुलायम सिंह यादव ने अपने गृह जनपद इटावा में एक कार्यक्रम को संबोधित करते हुये कहा कि देश के मुसलमानों की दशा दलितों से भी खराब है। हमारे देश के प्रधानमंत्री कहते हैं देश के संसाधनों पर पहला हक मुसलमानों का है। मायावती कहतीं हैं दलितों की स्थिति बहुत खराब है। उन्हीं की पार्टी के सतीष मिश्रा कहते हैं कि ब्राह्म्णों को उनका हक सिर्फ बहुजन समाज पार्टी ने दिया है। शिवपाल सिंह एक सार्वजनिक कार्यक्रम में कहते हैं कि यादवों के हित के बारे में सपा से बढ़कर कोई दल सोच ही नहीं सकता। बिहार के मुख्यमंत्री का कहना है उनसे ज्यादा कोई मुसलमानों का हितैशी हो नहीं सकता।
आप देश के ज्यादातर राजनीतिक दलों के प्रमुखों या उनके नेताओं के बयान सुन लीजिये सभी को किसी न किसा वर्ग, किसी न किसी सम्प्रदाय की चिंता है। खासकर मुसलमानों के तो सब हितैशी हैं। 
मुलायम सिंह को यह मालूम है कि मुसलमानों की स्थिति दयनीय है मगर प्रदेशवासियों की क्या स्थिति है यह नहीं मालूम। अखिलेश यादव को यह मालूम है कि मुस्लिम बालिकायें गरीबी झेल रहीं हैं मगर यह नहीं मालूम कि प्रदेश की बालिकाओं की क्या स्थिति है? 
मुझे यह समझ नहीं आता कि अखिलेश यादव ‘‘उत्तर प्रदेश’’ के मुख्यमंत्री है या ‘‘मुसलमानों’’ अथवा किसी विशेष जाति सम्पद्राय के मुख्यमंत्री हैं। ’’दलितों से भी दयनीय स्थिति में हैं मुसलमान’’ यह कहने की बजाय मुलायम सिंह यह क्यों नहीं स्वीकारते, यह क्यों नहीं कहते कि प्रदेश वासियों की स्थिति दयनीय है? और यदि है तो उसके लिये वह कर क्या रहे हैं। 
लाल किले से देश को संबोधित करते हुये हमारे प्रधानमंत्री कहते हैं कि हमने मुसलमानों के लिये यह किया है, दलितों के लिये यह किया है, जाटों के लिये यह किया है.................लेकिन यह क्यों नहीं कहते कि हमने भारतीयों के लिये यह किया है। वह कहते हैं कि देश के संसाधनों पर पहला हक मुसलमानों का है! तो भारतीयों का कोई हक नहीं है???? प्रधानमंत्री जी आप भारत के प्रधानमंत्री है मुसलमानों के नहीं।
             किसी खास सम्प्रदाय, जाति, धर्म को दयनीय कैसे बताया जा सकता है? क्या सभी मुसलमान दयनीय है? क्या सभी दलित दयनीय है? क्या गरीबी यह देखकर आती है कि कोई मुसलमान है या दलित? 
              क्या मुलायम सिंह बतायेंगे कि आजम खां, नसीमुद्दीन सिद्दीकी, सलमान खुर्शीद, फारूक अब्दुल्ला, औवैसी और न जाने कितने और ........................दयनीय हैं.........या यह मुसलमान नहीं हैं? 
             दलितों की स्थिति दयनीय बताने वाली मायावतीं क्या यह बतायेंगीं कि वह कितनी दयनीय हैं या तमाम प्रशासनिक और उच्च पदों पर बैठे दलित कितने दयनीय हैं? 
            नेतागण किसी जाति सम्प्रदाय या धर्म को दयनीय क्यों बताते हैं और इसका क्या आधार है? दयनीय होने या गरीबी होने 
की स्थिति क्या किसी खास जाति धर्म की ही होती हैं। 
गरीब तो कोई भी हो सकता है, किसी भी जाति का हो सकता है, किसी भी धर्म का हो सकता है। मैने मुसलमानों के लिये यह किया, दलितों के लिये यह किया.....यह सब कहने की बजाय यह क्यों नहीं कहते कि मैने अपने देशवासियों के लिये यह किया, अपने प्रदेश वासियों के लिये यह किया। 
मुसलमानों की स्थिति बताने के बजाय प्रदेश वासियों की स्थिति पर गौर क्यों नहीं करते? या मुसलमान देश/प्रदेश के वासी नहीं हैं? या नेताओं को लगता है कि प्रदेश वासी कहने से मुसलमान उनसे प्रसन्न नहीं होंगे। यदि यही सोच है तो चुनाव में प्रदेश के मुख्यमंत्री पद के उम्मीदवार या देश के प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार किस मुंह से कहते हैं? क्यों नहीं कहते कि मैं मुसलमानों के प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार हूं। मैं मुसलमानों के मुख्यमंत्री पद का उम्मीदवार हूं।
मुलायम सिंह जिंदाबाद के नारे लगाने वाले और उनकी पार्टी की सभाओं में झंडे लगाने से लेकर दरी बिछाने तक के काम करने वाला एक कार्यकर्ता जो मजदूरी करके गुजारा करता है, वह कई सालों से पार्टी की निस्वार्थ सेवा करता रहा है। आज भी जहां था वहीं है लेकिन उसी के पड़ोस का एक मुसलमान देखते-देखते कोठी और कारों का मालिक बन गया?? लेकिन उसके नेता जी के लिये मुसलमान दयनीय हैं !!!!!! 
आज पूरे देश की स्थिति दयनीय है, सभी हिन्दुस्तानियों की स्थिति दयनीय है, हमारी आर्थिक स्थिति की हालत दयनीय है, हमारी राजनीतिक स्थिति दयनीय है, हमारे नेताओं की मानसिक स्थिति दयनीय है, बेराजगारी से परेशान युवाओं की हालत दयनीय हैं, अपराधों से त्रस्त प्रदेश और देश की जनता की हालत दयनीय हैं। 
लेकिन नेता जी सिर्फ मुसलमानों की हालत दयनीय दिखायी देती है।
नेता जी आपकी अन्र्तआत्मा जानती है कि आप जो कह रहे हैं, कर रहे हैं वह गलत हैं। चाहे कांग्रेस हो, सपा हो, बसपा हो या कोई अन्य पार्टी सिर्फ मुसलमानों या दलितों से नहीं बनती। यह सब जानते हैं, लेकिन कुर्सी का लालच है!!!
  भारतीयों की स्थिति देखों, प्रदेश वासियों की स्थिति देखो और किसी धर्म, सम्प्रदाय की बात करने के बजाय देश और प्रदेश की बात करो।
सुधर जाओं नेताओं  क्यों कि तुम्हारें कर्मों/कुकर्मों  से यदि देश ही न बचा तो राजनीति कहां करोगे?????

शनिवार, 18 अगस्त 2012

स्वतंत्रता के मायने

रमजान के महीने का कुरान में पाक माना गया है, इस्लाम धर्म में अच्छा इन्सान बनने के लिए पहले मुसलमान बनना आवश्यक है और मुसलमान बनने के लिए बुनियादी पांच कर्तव्यों :- फराईज़द् का अमल में लाना आवश्यक है। यदि कोई व्यक्ति निम्नलिखित पांच कर्तव्यों में से किसी एक को भी ना माने तो वह मुसलमान नहीं हो सकता :-
ये फराईज हैं.
ईमान यानी कलिमा तय्यब जिसमें अल्लाह के परम पूज्य होने का इकरार उसके एक होने का यकीन और मोहम्मद साहब के आखिरी नबी ;दूत होने का यकीन करना शामिल है। इसके अलावा बाकी चार हैं .नमाज़ रोज़ा हज और ज़कात।
इस्लाम के ये पांचों फराईज़ इन्सान को इन्सान से प्रेम सहानुभूति सहायता तथा हमदर्दी की प्रेरणा देते हैं। यदि कोई व्यक्ति मुसलमान होकर इस सब पर अमल न करे तो वह अपने मजहब के लिए झूठा है।
रोज़े को अरबी में सोम कहते हैं जिसका मतलब है रुकना। रोज़ा यानी तमाम बुराइयों से रुकना या परहेज़ करना। ज़बान से गलत या बुरा नहीं बोलना आंख से गलत नहीं देखना कान से गलत नहीं सुनना हाथ.
पैर तथा शरीर के अन्य हिस्सों से कोई नाजायज़ अमल नहीं करना। रोज़े की हालत में किसी व्यक्ति के लिए यह आज्ञा नहीं है कि वह अपनी पत्नी को भी इस नीयत से देखे कि उसके मन में कामवासना जगे। गैर औरत के बारे में तो ऐसा सोचना ही हराम है।
रोज़े में दिन भर भूखा व प्यासा ही रहा जाता है जिससे इन्सान में एक वक्ती कमज़ोरी आ जाती है और वह किसी भी हैवानी काम के विषय में नहीं सोचता शोर नहीं मचाता हाथापाई नहीं करता इत्यादि। इसी तरह यदि किसी जगह लोग किसी की बुराई कर रहे हैं तो रोज़ेदार के लिए ऐसे स्थान पर खड़ा होना मना है।
जब मुसलमान रोज़ा रखता है भूखा.प्यासा रहता है तो उसके हृदय में भूखे व्यक्ति के लिए हमदर्दी पैदा होती है।
रमज़ान के माह में मुसलमान के हर नेक अमल यानी पुण्य के कामों का सबाव 70 गुना बढ़ा दिया जाता है। 70 गुना अरबी में मुहावरा है जिसका मतलब होता है बेशुमार। इसलिए प्रत्येक व्यक्ति अपने पुण्य के कामों में अधिक से अधिक हिस्सा लेता है।
 रोजा  झूठ हिंसा बुराई रिश्वत तथा अन्य तमाम गलत कामों से बचने की प्रेरणा देता है। इसकी मश्क यानी ;अभ्यास पूरे एक महीना कराया जाता है ताकि इंसान पूरे साल तमाम बुराइयों से बचे और इंसान से हमदर्दी का भाव रखे।
ते यह तो हैं कुरान के अनुसार मुसलमानों की परिभाषा फिर उपद्रव करने वाले कौन हैं, दंगा करने, गाडि़यों में तोड़-फोड़ करने, मारपीट करने, दुकाने लूटने वाले कौन हैं? दरअसल दंगाई न हिंदू होते हैं न मुसलमान दंगाई सिर्फ और सिर्फ दंगाई होते हैं। उनका मकसद् समाजिक सौहार्द को बिगाड़ना और अपना उल्लू सीधा करना होता है। दुकानों में लूट-पाट करते वक्त, महिलाओं के साथ छेड़छाड़ करते वक्त उनका इरादा इस्लाम का भला करना नहीं वरन मौके का फायदा उठाना होता है।
हां हमारी सरकार (चाहे वह केन्द्र की हो राज्य की) को जरूर दंगाइयों के रूप में धर्म की व्याख्या करना बहुत अच्छी तरह आता है, सरकार के लिये पाक कुरआन के अनुसार ऊपर दिये गये गुणों वाला मुसलमान नहीं है न ही वह मुसलमानों का नुमाइंदा है, सरकार को यह दंगाई ही मुसलमानों के सच्चे नुमाइंदे दिखायी देते हैं और उसको लगता है कि यदि इनके खिलाफ कड़ी कार्यवाही की तो उसका वोट बैंक गड़बड़ा जायेगा। समझ में नहीं आता कि सरकार दंगाइयों के ऊपर सख्त कार्यवाही करते वक्त उन्हें धर्म के चश्मे से क्यों देखती है और जब कभी-कभी दूसरे समुदाय के ओर से भी प्रतिक्रिया होती है तो तमाम राजनैतिक दल, तथाकथित मानवाधिकार समर्थक संगठन आसमान सर पर उठा लेते हैं और जब यह उपद्रवी, दंगाई (सरकारी चश्मे से देखने पर मुसलमान) उपद्रव करते हैं तो इनके खिलाफ सख्त कार्यवाही क्यों नहीं की जाती? अगर एक दो शहरों में इस तरह की हरकत करने वालों पर सख्त कार्यवाही हो तो दंगे की आग एक-एक कर दूसरे शहरों को भी अपनी चपेट में क्यों ले? क्यों नहीं इस पर प्रभावी तरीके से रोक लगाई जाती है। डर है कहीं वोट बैंक न खिसक जाये!!! मुस्लिमों पर सरकार ने कार्यवाही कर दी!!!!!!!!!!!!!!! क्यों नहीं समझा जाता कि यह सिर्फ उपद्रवी है और एक सच्चे मुसलमान को इनके प्रति हमदर्दी भी हीं होगी न ही होनी चाहिये और जिन्हें है वह किसी दंगाई से कम नहीं है।
हमारे देश में स्वतंत्रता का मतलब क्या है? जब चाहो, जहां चाहो लूटपाट शुरू कर दो, जहां चाहो सार्वजनिक और निजी सम्पत्ति को नुकसान पहुंचाओ। आखिर लखनऊ के पार्क में तथाकथित मुसलमानों ने जिन महिलाओं के कपड़े फाड़े उनका क्या कसूर था? जिन निर्दोश दुकानदारों की रोजी-रोटी छीनी उनका क्या कसूर था? लेकिन हमारी सरकार है कि उसके लिये यह सब आम घटनायें हैं। उसके लिये खास तब तक नहीं होता जब तक सड़कों पर खून न बहे।
दुनियां में बहुत से देश हैं जहां सभी धर्मों के लोग रहते हैं? मगर क्या किसी देश में किसी धर्म विशेष के लिये ‘‘पर्सनल लाॅ’’ का प्रावधान है???? यह हमारा देश ही है? क्यों ? क्योंकि हमारे देश के राजनैताओं के लिये देशहित से अधिक स्वयं का हित, सत्ता का सुख महत्व रखता है। उनके लिये इसके कोई मायने नहीं कि देश का क्या होगा? उनके लिये यह मायने है कि कहीं हमारी कुर्सी न चली जाये। क्यों नहीं देश में समान नागरिक संहिता लागू की जाती? और अगर धर्म के आधार पर ’’पर्सनल लाॅ’’ की इजाजत है तो बाकी धर्मों के भी पर्सनल लाॅ हो सकते हैं। फिर देश का कानून!!! खूंटी पर टाग दिया जाये ना!!! क्यों कि हर धर्म का अपना अलग कानून होगा। अदालतों में हर धर्म के जजों की नियुक्ति की जाये। बार कौसिंल, वकालत बंद कर दी जाये। मुस्जिदों, मंदिरों, गिरजाघरों में तैयार की जाये ‘‘पर्सनल लाॅ’’ के एडवोकेट।
कितना हास्यापद है इस देश का कानून और इस देश के राजनैतिक दलों का आचरण। शायद इनके लिये स्वतंत्रता के मायने यहीं हैं कि जनता को मरने दो अपनी कुर्सी सुरक्षित रखो।