शनिवार, 7 जनवरी 2017

काम बोलता है! पर झूठ बोलता है

अभी तक अखबारों और समाचार पत्रों के माध्यम से मैं सुन रहा था कि "काम बोलता है!" मुझे भी भरोसा होने लगा था कि काम होगा तो बोलेगा ही! ☺ पर आज तो "काम" ने सीधे मुझसे बात की, बोले तो....... सीधे काम बोला और मेरे नम्बर पर बाकायदा फोन किया, पर उसके फोन करने के बाद मुझे लगा कि भाई अब तो "काम भी झूठ बोल रहा है☺।" 
मित्रों आज मैं यह कोई व्यंग नहीं लिख रहा हूं न ही कोई कहानी है, आज मेरे साथ कुछ वाकया ही ऐसा हुआ है जो मजबूरन भरोसा करना पड़ा है कि काम बोलता तो है! मगर झूठ बोलता है। 
आज मेरे पास 12 बजकर 40 मिनट पर 0522-6691750 नम्बर से फोन आया, और उधर से बोलने वाली मोहतरमा ने सूचित किया कि वह ‘‘माननीय मुख्यमंत्री जी के कार्यालय से बोल रही हैं! आश्वस्त होने के लिये मैने पुनः प्रश्न किया कि कहां से बोल रही हैं? 
       ‘‘उधर से कन्फर्म किया गया कि मुख्यमंत्री कार्यालय से ही फोन है, और माननीय मुख्यमंत्री जी यह जानने के इच्छुक है कि आपके परिवार की दुलारी जी को समाजवादी पेंशन समय से मिल रही है या नही!!?????
दुलारी जी !! यह कौन हैं? मैने पूछा।
   तो उन मैडम ने बताया कि आपके परिवार की हैं और आपको नहीं पता?
मैने कहा कि मेरे परिवार में कोई भी इस नाम का महापुरूष नहीं हैं।
मैडम ने प्रश्न किया, ‘‘आपके परिवार मंे किसी को भी समाजवादी पेंशन नहीं मिल रही है?’’
‘‘समाजवादी क्या मेरे परिवार में कभी किसी को किसी प्रकार की कोई पेंशन नहीं मिली,
और तो और मेरी छोटी बहन ने एक बार जिद करके छात्रृवृत्ति का फार्म भर दिया था, काफी इंतजार करने पर जब उसको छात्रवृत्ति नहीं मिली तब उसने अपने काॅलेज/बैंक में पूछा तो बताया गया कि आपकी छात्रवृत्ति नेपाल में भूकम्प पीड़ितों की सहायतार्थ भेज दी गई। 
अब भला बिना फार्म भरे मेरे परिवार में किसी को पेंशन कैसे मिलने लगी।
फोन करने वाली मैडम ने पुनः आश्वस्त होना चाहा, ‘‘सर क्या सच में आपके घर में किसी को पेंशन नहंी मिली?’’ मेरे स्पष्ट इन्कार करने पर उन्होंने कहा ‘‘सर मेरे रिकार्ड में तो आपके यहां पेंशन जा रहीं है?’’
मैं उनसे कुछ और पूछना चाहता था, पर शायद उनको शर्मिंदगी लगी सो उन्होने फोन काट दिया।
यदि आप में से कोई मित्र यह फोन रिकार्डिंक सुनने का इच्छुक हो तो मुझे 9125939294 पर व्हाट्सएप सन्देश भेज सकता है।

शनिवार, 31 दिसंबर 2016

नववर्ष की पूर्व संध्या पर प्रधानमंत्री मोदी के भाषण की खास बातें

  • किसानों के फसली कर्ज पर 60 दिन का ब्याज सरकार वहन करेगी, यह धनराशि उनके खातों में भेजी जायेगी।
  • छोटे कारोबारियों के लिये क्रेडिट गारंटी एक करोड़ से बढ़ाकर दो करोड़ करेगी। दो करोड़ तक के लोन की गारंटी सरकार लेगी।
  • 3 करोड़ किसान क्रेडिट कार्ड रूपे कार्ड में बदले जायेंगे।
  • मुद्रा योजना के अन्तर्गत 3.5 करोड़ लागों ने फायदा उठाया है, अब सरकार का इसे दोगुना करने का इरादा है।
  • गर्भवती महिलाओं के लिये योजना: देश के 650 सभी जिलों में 6000 रुपये देने की योजना लान्च की।
  • वरिष्ठ नागरिकों के लिये स्कीम: वरिष्ठ नागरिकों के लिये सालाना 8 प्रतिशत की ब्याज दर सुरक्षित की जायेगी।
  • प्रधानमंत्री ने कैशलेस अर्थव्यवस्था के लिये ज्यादा से ज्यादा अपनाने पर जोर दिया।
  • कल लान्च किये "भीम" एप को अपनाने का किया आवाह्न।
  • प्रधानमंत्री ने कहा आज से सौ साल पहले 1917 में महात्मा गांधी के नेतृत्व चंपारण में सत्याग्रह का आंदोलन शुरू हुआ था, आज भी हमने देखा कि सच्चाई और अच्छाई के प्रति लोगों में वही विश्वास है।
  • 2017 में घर बनाने के 9 लाख तक के लोन पर 4 प्रतिशत और 12 लाख तक के लोन के लिए 3 प्रतिशत की छूट मिलेगी
  • क्‍या आपको नहीं लगता कि देश की भलाई के लिए ईमानदारी के आंदोलन को और अधिक ताकत देनी की जरूरत है.
  • भाइयों-बहनों, कानून कानून का काम करेगा. पूरी कठोरता के साथ करेगा.
  • हमारी ये भी प्राथमिकता है कि ईमानदार कैसे सुरक्षित रहे और वो कैसे प्रतिष्ठित रहे.
  • ये सरकार सज्‍जनों की मित्र है और दुर्जनों को सज्‍जन बनाने के लिए उपयुक्‍त वातावरण देगी.
  • पिछले कुछ दिनों की घटनाओं से सिद्ध हो गया है कि बेईमानों के लिए आगे का रास्‍ता अब आसान नहीं.
  • देशवासियों के धैर्य से शुद्धि यज्ञ चला.
  • सवा सौ करोड़ देशवासियों ने तकलीफें झेलकर यह सिद्ध कर दिया है कि हर हिंदुस्‍तानी के लिए सच्‍चाई कितनी अहमियत रखती है.
  • आपने मुझे अपना मानकर कई बातें कही हैं, आपका प्‍यार आशीर्वाद की तरह है.
  •  प्रधानमंत्री ने कहा की पूरा प्रयास है कि नववर्ष में बैंकों में सामान्‍य स्थिति बहाल हो जाएगी.
  • नोटबंदी के दौरान गड़बड़ी करने वाले और फायदा उठाने का प्रयास करने वाले किसी भी व्यक्ति को बक्श नहीं जायेगा।  

नव वर्ष की हार्दिक शुभकामनायें



"प्रियजन, परिजन, मित्रजन पायें नव उल्लास,
मिले सभी को नव ख़ुशी, नित्य नया विश्वाष.
मन में हो नव कल्पना, तन में नव उत्कर्ष 
सपरिवार हो आपको मंगलमय नववर्ष"
आप सभी को नए वर्ष की हार्दिक शुभकामनायें

मंगलवार, 27 सितंबर 2016

Quotes जो आपकी ज़िंदगी बदल दें.

                कहा जाता है कभी-कभी कुछ Quotes आपकी सोच बदल सकते हैं, सही भी है. एक बार की बात है एक लड़का अपनी बेरोजगारी से परेशान होकर आत्महत्या करने के लिए नदी में छलांग लगाने के लिए पुल पर पहुच गया, वह कूदने ही वाला था की तभी एक कागज का टुकड़ा उड़ता हुआ वहां आ गिरा और अनायास ही लड़के की नज़र उस पर चली गयी। .....वह एक अख़बार का टुकड़ा था जिस पर बड़े अक्षरों एक Quote लिखा था, लड़के ने उसे पढ़ा और अगले ही पल आत्महत्या का विचार त्याग दिया।

वाकई कुछ विचार मन को एक नयी ऊर्जा से भर देते हैं, अपने पाठको के लिए प्रस्तुत है कुछ ऐसे ही विचार।
  • सफलता Experience से आती हैं और Experience.. Bad experience से।
  • जो लोग अपनी सोच नही नही बदल सकते वो जिंदगी में कुछ नही बदल सकते।
  • तुम अपने दिमाग को कंट्रोल कर लो, नहीं तो फिर यह तुम्हें कंट्रोल करेगा।
  • जिस व्यक्ति ने अपनी आदतें बदल लीं उसका कल अपने आप बदल जाएगा, और जिसने नहीं बदलीं, उसके साथ कल भी वही होगा जो आज तक होता आया हैं।
  • अगर आप उस इंसान की तलाश कर रहे हैं जो आपकी ज़िन्दगी बदलेगा, तो आईने में देख लें।
  • अगर आप महानता हासिल करना चाहते हैं तो इजाजत लेना बंद किजिए।
  • गलतियां इस बात का सबूत हैं कि आप कम से कम प्रयास तो कर रहे हैं।
  • एक ‘इच्छा’ कुछ नहीं बदलती, एक ‘निर्णय’ कुछ बदलता हैं, लेकिन एक ‘निश्चय’ सब कुछ बदल देता हैं।
  • सफलता हमेशा अकेले में गले लगाती हैं.. लेकिन असफलता हमेशा सबके सामने तमाचा मारेगी.. यही जीवन हैं।
  • चाहे तालियां गूँजें या फीकी पड़ जाएँ, अंतर क्या हैं ? इससे मतलब नहीं है कि आप सफल होते हैं या असफल. बस काम करिये, कोई काम छोटा या बड़ा नहीं होता।
  • मैं सिर्फ good luck को मानता हूँ, bad luck नाम की इस दुनिया में कोई चीज नहीं, क्योंकि जो होता हैं अच्छे के लिए होता हैं। इसका मतलब हमारे साथ कुछ बुरा भी हो रहा हैं तो बुरा लग रहा हैं बुरा हैं नहीं, आज बुरा लग रहा हैं आगे आने वाले टाइम पर पता चलता हैं कि वो भी अच्छे के लिए हुआ हैं।
  • वो क्या सोचेगा…ये मत सोचो…वो भी यही सोच रहा हैं. एक समय लोग मुझसे कहते थे.. ये ले दस रुपये और मेरी photo खींच दे.. अगर मैं यही सोचता कि लोग क्या कहेंगे तो मैं आज यहाँ नहीं होता.. “दुनिया का सबसे बड़ा रोग क्या कहेंगे लोग”।
  • सीखो सबसे, परन्‍तु follow किसी को मत करो।

गुरुवार, 24 अक्टूबर 2013

कल रात माँ के कमरे में आई एस आई वाले आये....

कांग्रेस के युवराज राहुल गांधी के बयानो को देखकर आजकल ऐसा लगता है जैसे या तो उनका भाषण लिखने वाला भी कांग्रेस के भ्रष्टाचार से परेशान है और इसका बदला वह राहुल गांधी के लिये ऐसे ऊट-पटांग और बेसिरपैर के भाषण लिखकर ले रहा है या किसी कारणवश राहुल की मानसिक स्थिति डावांडोल हो गई है परिणामस्वरूप वह कब कहां क्या कह जायें उन्हें खुद नहीं मालूम होता।
कभी दादी, नानी और पापा की कहानियां सुनाते हैं। कभी उनके अच्छे!! कार्यों के बारे में बताते हैं। शायद राहुल गांधी के घर में कहानियों की किताबों पर प्रतिबन्ध रहा होगा परिणामस्वरूप उन्हें और कोई कहानी पढ़ने को ही नहीं मिली सिर्फ अपने परिवार की कहानियां ही मालूम हैं। उन्हें शायद यह नहीं मालूम कि इस देश में दादी, मम्मी, पापा के अलावा अदद सवा करब लोग और भी रहते हैं और उनमें से बहुत ऐसे हैं जिनकी कहानी में दादी, मम्मी और पापा की कहानी से कहीं ज्यादा दम है। 
खैर कहानी का क्या, दर्शक जब मूवी देखता है और उसमें एक अभिनेता सैकड़ों लोगों को अकेले मारता या कुछ और अजब-गजब करता है तो दर्शक जमकर ताली बजाते हैं और उसका आनन्द लेते हैं यह अच्छी तरह जानते हुये भी कि यह सब सिर्फ कल्पना है और इसका असलियत से कोई वास्ता नहीं। 
          कहानी तो चलती हैं। लोग मनोरंजन के लिये सही उसको देखते हैं। लेकिन कहानी सुनाते-सुनाते राहुल बाबा यह ही भूल गये कि कहानी का असल पात्रों से मेलजोल होना कभी-कभी गले की हड्डी बन जाता है।
आज राहुल ने अपने भाषण में मुजफ्फरनगर दंगो का जिक्र किया लेकिन शायद यह भूल गये कि यह दादी की सुनाई कहानी नहीं असलियत है और जो कुछ कहा वह इस सवा करब से भी अधिक के देश को शर्मशार करने और हर देशप्रेमी का खून खौलाने के लिये काफी है।
                  राहुल उवाच ‘‘एक इंटेलीजेंस का आदमी उनके कमरे में आया और उसने कहा, राहुल जी आपको क्या बताऊं मुजफ्फरनगर दंगो में 10-12 जो मुसलमान लड़के मारे गये हैं उनके परिवार वालों के संपर्क में आईएसआई है। वह उनसे बात करके उन्हें बरगला रही है। हम लोग अपनी ओर से पूरी कोशिष कर रहे हैं लड़कों को समझाने की कि इनकी बातों में मत आओ।‘‘
             राहुल इस बात को खुले मंच से देश-विदेश के मीडिया के सामने कह रहे हैं। उन्हे शर्म नहीं आती यह कहते हुये कि हमारे देश के अंदरूनी मामलों में कोई विदेशी खुफिया एजेंसी दखल दे रही है? भारत में सरकार नाम की कोई चीज बची है क्या? कभी किन्नरों के किसी शिविर में उनकी बिना मर्जी जाकर देखिये शायद लेने के देने पड़ जायेगे। क्या इस देश की सरकार किन्नरों से भी गयी बीती है?
               राहुल ने इस कहानी को देशी-विदेशी मीडिया के सामने कहा, क्या जैसे ही उन्हें इस बात का पता चला उन्होंने देश के प्रधानमंत्री को सूचना दी? क्या उन्होंने उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री को इस बारे में सूचना दी? क्या उन्होंने किसी सक्षम ऐजेंसी को इस बारे में सूचना दी? अगर राहुल की कहानी सही है तो क्या किसी देश के अंदरूनी मामलों में हद दर्जे की दखलंदाजी सामने आने के बाद भी राहुल गांधी ने उस पर क्या कार्रवाई करवाई? इतनी गोपनीय और संवदेनशील जानकारी इंटेलीजेंस आॅफिसर ने राहुल गांधी को क्यों दी? उनकी सरकार में वैधानिक हैसियत क्या है? 
                     या फिर देश की विश्व में इस तरह छीछा-लेदर करवाकर राहुल गांधी को लगता है कि उन्हें वोट मिल जायेंगे? 
        क्या कल राहुल गांधी यह भी कहेंगे कि एक आदमी मेरे कमरे में आया और उसने बताया कि मेरी मां को आईएसआई बरगलाने की कोशिष कर रही है और हम उन्हें समझा रहे हैं कि इसकी बातों में मत आओ???

रविवार, 6 अक्टूबर 2013

कभी देश और देशवासियों की स्थिति भी देख लीजिये नेताजी!!

          समाजवादी पार्टी के मुखिया मुलायम सिंह यादव ने अपने गृह जनपद इटावा में एक कार्यक्रम को संबोधित करते हुये कहा कि देश के मुसलमानों की दशा दलितों से भी खराब है। हमारे देश के प्रधानमंत्री कहते हैं देश के संसाधनों पर पहला हक मुसलमानों का है। मायावती कहतीं हैं दलितों की स्थिति बहुत खराब है। उन्हीं की पार्टी के सतीष मिश्रा कहते हैं कि ब्राह्म्णों को उनका हक सिर्फ बहुजन समाज पार्टी ने दिया है। शिवपाल सिंह एक सार्वजनिक कार्यक्रम में कहते हैं कि यादवों के हित के बारे में सपा से बढ़कर कोई दल सोच ही नहीं सकता। बिहार के मुख्यमंत्री का कहना है उनसे ज्यादा कोई मुसलमानों का हितैशी हो नहीं सकता।
आप देश के ज्यादातर राजनीतिक दलों के प्रमुखों या उनके नेताओं के बयान सुन लीजिये सभी को किसी न किसा वर्ग, किसी न किसी सम्प्रदाय की चिंता है। खासकर मुसलमानों के तो सब हितैशी हैं। 
मुलायम सिंह को यह मालूम है कि मुसलमानों की स्थिति दयनीय है मगर प्रदेशवासियों की क्या स्थिति है यह नहीं मालूम। अखिलेश यादव को यह मालूम है कि मुस्लिम बालिकायें गरीबी झेल रहीं हैं मगर यह नहीं मालूम कि प्रदेश की बालिकाओं की क्या स्थिति है? 
मुझे यह समझ नहीं आता कि अखिलेश यादव ‘‘उत्तर प्रदेश’’ के मुख्यमंत्री है या ‘‘मुसलमानों’’ अथवा किसी विशेष जाति सम्पद्राय के मुख्यमंत्री हैं। ’’दलितों से भी दयनीय स्थिति में हैं मुसलमान’’ यह कहने की बजाय मुलायम सिंह यह क्यों नहीं स्वीकारते, यह क्यों नहीं कहते कि प्रदेश वासियों की स्थिति दयनीय है? और यदि है तो उसके लिये वह कर क्या रहे हैं। 
लाल किले से देश को संबोधित करते हुये हमारे प्रधानमंत्री कहते हैं कि हमने मुसलमानों के लिये यह किया है, दलितों के लिये यह किया है, जाटों के लिये यह किया है.................लेकिन यह क्यों नहीं कहते कि हमने भारतीयों के लिये यह किया है। वह कहते हैं कि देश के संसाधनों पर पहला हक मुसलमानों का है! तो भारतीयों का कोई हक नहीं है???? प्रधानमंत्री जी आप भारत के प्रधानमंत्री है मुसलमानों के नहीं।
             किसी खास सम्प्रदाय, जाति, धर्म को दयनीय कैसे बताया जा सकता है? क्या सभी मुसलमान दयनीय है? क्या सभी दलित दयनीय है? क्या गरीबी यह देखकर आती है कि कोई मुसलमान है या दलित? 
              क्या मुलायम सिंह बतायेंगे कि आजम खां, नसीमुद्दीन सिद्दीकी, सलमान खुर्शीद, फारूक अब्दुल्ला, औवैसी और न जाने कितने और ........................दयनीय हैं.........या यह मुसलमान नहीं हैं? 
             दलितों की स्थिति दयनीय बताने वाली मायावतीं क्या यह बतायेंगीं कि वह कितनी दयनीय हैं या तमाम प्रशासनिक और उच्च पदों पर बैठे दलित कितने दयनीय हैं? 
            नेतागण किसी जाति सम्प्रदाय या धर्म को दयनीय क्यों बताते हैं और इसका क्या आधार है? दयनीय होने या गरीबी होने 
की स्थिति क्या किसी खास जाति धर्म की ही होती हैं। 
गरीब तो कोई भी हो सकता है, किसी भी जाति का हो सकता है, किसी भी धर्म का हो सकता है। मैने मुसलमानों के लिये यह किया, दलितों के लिये यह किया.....यह सब कहने की बजाय यह क्यों नहीं कहते कि मैने अपने देशवासियों के लिये यह किया, अपने प्रदेश वासियों के लिये यह किया। 
मुसलमानों की स्थिति बताने के बजाय प्रदेश वासियों की स्थिति पर गौर क्यों नहीं करते? या मुसलमान देश/प्रदेश के वासी नहीं हैं? या नेताओं को लगता है कि प्रदेश वासी कहने से मुसलमान उनसे प्रसन्न नहीं होंगे। यदि यही सोच है तो चुनाव में प्रदेश के मुख्यमंत्री पद के उम्मीदवार या देश के प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार किस मुंह से कहते हैं? क्यों नहीं कहते कि मैं मुसलमानों के प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार हूं। मैं मुसलमानों के मुख्यमंत्री पद का उम्मीदवार हूं।
मुलायम सिंह जिंदाबाद के नारे लगाने वाले और उनकी पार्टी की सभाओं में झंडे लगाने से लेकर दरी बिछाने तक के काम करने वाला एक कार्यकर्ता जो मजदूरी करके गुजारा करता है, वह कई सालों से पार्टी की निस्वार्थ सेवा करता रहा है। आज भी जहां था वहीं है लेकिन उसी के पड़ोस का एक मुसलमान देखते-देखते कोठी और कारों का मालिक बन गया?? लेकिन उसके नेता जी के लिये मुसलमान दयनीय हैं !!!!!! 
आज पूरे देश की स्थिति दयनीय है, सभी हिन्दुस्तानियों की स्थिति दयनीय है, हमारी आर्थिक स्थिति की हालत दयनीय है, हमारी राजनीतिक स्थिति दयनीय है, हमारे नेताओं की मानसिक स्थिति दयनीय है, बेराजगारी से परेशान युवाओं की हालत दयनीय हैं, अपराधों से त्रस्त प्रदेश और देश की जनता की हालत दयनीय हैं। 
लेकिन नेता जी सिर्फ मुसलमानों की हालत दयनीय दिखायी देती है।
नेता जी आपकी अन्र्तआत्मा जानती है कि आप जो कह रहे हैं, कर रहे हैं वह गलत हैं। चाहे कांग्रेस हो, सपा हो, बसपा हो या कोई अन्य पार्टी सिर्फ मुसलमानों या दलितों से नहीं बनती। यह सब जानते हैं, लेकिन कुर्सी का लालच है!!!
  भारतीयों की स्थिति देखों, प्रदेश वासियों की स्थिति देखो और किसी धर्म, सम्प्रदाय की बात करने के बजाय देश और प्रदेश की बात करो।
सुधर जाओं नेताओं  क्यों कि तुम्हारें कर्मों/कुकर्मों  से यदि देश ही न बचा तो राजनीति कहां करोगे?????

बुधवार, 2 अक्टूबर 2013

परी

बाल मन कितना संवदेनशील होता है, कितना काल्पनिक होता है, कितनी मधुर स्मृतियां होतीं हैं बचपन की। लगता है काश लौट आये फिर वही समय या हम लौट जायें बीते समय में। लेकिन ऐसा कुछ भी तो नहीं हो पाता। अब हम जानते हैं कि यह सब महज एक कल्पना है। लेकिन बचपन! बचपन में सब कुछ हो सकता है। हाथी उड़ सकता है, मछलियां रेत पर सरपट दौड़ सकतीं हैं, परियां सारे दुःख समाप्त कर सकतीं हैं यहां तक कि छोटे-छोटे कामों के लिये वह आ सकतीं हैं। अब मेरे बुलाये से नहीं आती कोई परी, नहीं उड़ते हाथी तो बचपन क्या करे? बचपन तो कहता है परी रानी आओ, मेरे साथ खेलो, आओ ना।
बहुत शौक था मुझे बचपन में कहांनियां सुनने का लेकिन मेरे पिता जी को समय ही नहीं मिल पाता था कहांनियां सुनाने का, फिर भी मेरी इच्छा पूरी करने का प्रयास उन्हांेने हमेशा किया। बाल पत्रिकायें ला देते थे मेरे लिये। जिन्हें पढ़कर मैं कल्पनाओं के सागर में गोते लगता रहता। 
माना कि मां-बाप की गोद में सर रखकर कहानी सुनने की इच्छा पूरी नहीं होती थी, क्यों मां व मेरी दीदी गांव में रहतीं थीं, मैं पिताजी के पास शहर में रहकर पढ़ाई कर रहा था। कहानियों के संसार में रहकर लगता था कि अभी कोई परी आयेगी। मुझे गोद में बिठायेगी और सुनायेगी ढेरों कहानियां, मीठी-मीठी आवाज में। मैं सो जाऊंगा उसकी गोद में। 
अक्सर आती भी थी परी, सुनाती थी कहानी, लेकिन जब दरवाजा खटकता था और नींद खुलती थी तो पता चलता कि वह तो बस एक सपना था।
आज मैं तर्क करता हूं, लोगों को बताता हूं कि यह अंधविश्वास है, वह अंधविश्वास है। छात्र-छात्राओं को समझाता हूं कि मेहनत करो तभी सफलता मिलेगी। कोई परी नहीं आने वाली तुम्हारी मदद के लिये। आज मेरे लिये यह सब कोरी कल्पनायें हैं मगर बचपन में यही मेरा संसार था जिसमें मेरा ज्यादातर समय बीतता था।
मुझे याद है पिताजी ढेर सारी पत्रिकायें लाते थे। एक दिन बालहंस का परी कथा विशेषांक लाये, इसकी कहानियां मन को न जाने कितना गहराई में छू गईं।
मोनू अकेला रहता था, उसके मां-बाप दोनों आॅफिस चले जाते थे और फिर आंगन में खड़े नीम की डाल पर आ जाती थी एक नन्हीं परी। मोनू बुलाता था तो उतर आती थी पेड़ से फिर खेलती दिन भर, मोनू के साथ, पढ़ती थी। मोनू बहुत खुश रहता। जब मम्मी-पापा के आॅफिस से आने का समय होता तो परी टाटा करके चली जाती।
राजू तो गांव में रहता था, उसकी सौतेली मां उसे दिन भर पीटती थी। दिन भर वह बकरियां चराता था फिर भी पेट भर खाना तक नहीं मिलता था। उस दिन उसकी मां ने उसे बहुत मारा भूखे ही भगा दिया, बकरियां चराने के लिये। जंगल में आम के पेड़ के नीचे बैठकर राजू रोने लगा और फिर आ गई परी रानी। राजू को चुप कराया। जादू की छड़ी घुमाई बस खाना हाजिर, इतना स्वादिष्ट खाना तो राजू ने कभी नहीं खाया था। फिर तो रोज आने लगी परी रानी। राजू को पढ़ाने भी लगी। राजू प्रसन्न रहने लगा था। 
मैं भी तो रहता हूं अकेला। मम्मी गांव में रहतीं हैं, पापा आॅफिस चले जाते हैं। परी क्यों नहीं आती? शायद मेरे घर में नीम या आम का पेड़ नहीं है। मगर जामुन का पेड़ तो है। इसी पर आ जाये नन्हीं परी। पापा के आॅफिस जाने के बाद गर्मियों की भरी दोपहरी में मैने अपने आंगन में खड़े जामुन के वृक्ष की एक-एक डाल को देखा शायद किसी डाल पर पत्तों में छिपी बैठी हो नन्हीं परी। एक-एक डाल मेरी नजरों गुजर रही थी। अरे वह क्या! घने पत्तों में कोई है, परी! तब तक डाल हिली और पत्तों में से एक मोटा सा बंदर कूद कर भाग गया। 
परी नहीं दिखी कोई बात नहीं, दूसरे, तीसरे, चैथे, पांचवें अब तो हर दिन दोपहर में आंगन में जामुन के पेड़ की छाया में बैठककर जामुन की डाल पर परी को देखने की कोशिष करता मैं। मगर परी नहीं आयी। क्यों नहीं आयी? शायद मैं रोता नहीं हूं इसीलिये। हूं अब देखता हूं कैसे नहीं परी, न जाने कैसे मैं दुःखी हो गया और अगले दस मिनट में मेरा चेहरा आंसुओं से भीग चुका था। अब तो जरूर आयेगी परी।
तब तक दरवाजा खटका, जल्दी से आंसू पोंछे। पता नहीं कौन आ गया। दरवाजा खोला तो सामने मां खड़ी थी। छिपा लिया मां ने आंचल में मुझे, भूल गया मैं परी को, वैसे भी अब परी का क्या काम।