शुक्रवार, 21 सितंबर 2012

गीत





कभी रोने लगे,
कभी हंसने लगे।
सोये ख्वाब क्यों, 
आज जगने लगे।
कहीं प्यार तो नहीं हो गया है हमें।।..............................

दूर से, दूर से गुनगुनाता कोई,

लग रहा जैसे मुझको बुलाता कोई।
क्या हुआ, कब हुआ,
हम समझ पाये ना।
खोये-खोये से हम क्यों रहने लगे।। कहीं ................

हमको महलों के सुख अब हैं भाते नहीं,
जाने क्यों हम कहीं चैन पाते नहीं।
चुप रहें क्या कहें
और बतलायें क्या
कल्पनाओं की धारा में बहने लगे।। कहीं ...........................................

आइने में भी चेहरा न खुद का दिखे,
देखता हूं जिधर रूप उनका दिखे।
क्या इधर क्या उधर 
हर तरफ वो ही वो।
पास ही हमको हर पल वो लगने लगे।। कहीं .............................

जाते हैं हम कहीं और पहुंचते कहीं,
रूकना चाहें कहीं और रूकते कहीं।
कुछ हुआ, कब हुआ
किससे पूछें ये हम।
जाने हम ये क्या-क्या करने लगे।। कहीं ...........................................

सोमवार, 27 अगस्त 2012

सभी रोगों की अचूक औषधि है तुलसी


भगवान कृष्ण को अति प्रिय मानी जाने वाली तुलसी लगभग सभी हिन्दुओं के आंगनों में देखी जा सकती है। तुलसी मुख्यतया दो प्रकार की होती है, श्यामा एवं रामा। श्यामा तुलसी के पत्ते हल्का काला रंग लिये हुये होते हैं, जबकि रामा तुलसी के पत्ते हरे एवं भूरे रंग के होते हैं।
तुलसी के बारे में एक कथा प्रचलित है कि एक बार जब युधिष्ठर राजसूय यज्ञ कर रहे थे उस समय सभी राजा जीते जा चुके थे पर जरासंध को जीतना मुश्किल हो रहा था क्योंकि उसकी पत्नी वृंदा पतिव्रता थी उसके पतिव्रत धर्म के कारण वह मारे नहीं मरता था। वृंदा का पतिवृत धर्म नष्ट करने के लिये कृष्ण ने कपट से जरासंध का रूप धारण कर लिया और वृंदा का पतिवृत धर्म नष्ट कर दिया। जब वृंदा को अपने साथ हुये इस धोखे का पता चला तो उसने कृष्ण को श्राप दिया कि तुम पत्थर हो जाओ जिससे कृष्ण सालिगराम बन गये। उसी समय वहां लक्ष्मी जी आ गईं उन्होंने गुस्से में वृंदा को श्राप दिया कि तुम जड़ हो जाओ जिससे वृंदा तुलसी रूपी पौधा बन गई। झगड़ा बढ़ता देखकर भगवान कृष्ण ने अपनी गलती स्वीकार करते हुये बीच-बिचाव कराया और वृंदा को वरदान दिया कि आज से मैं किसी भी पूजन में कोई भी भोग बिना तुलसी के स्वीकार नहीं करूंगा। तभी से भगवान के पूजन में तुलसी दल का प्रयोग अनिवार्य हो गया।
यह तो हुई पौराणिक बात। इस संबंध में विज्ञानियों का कहना है कि तुलसी को धर्म को जोड़ने का उद्देश्य इस छोटे से पौधे को लुप्त होने से बचाना था, भारत के प्राचीन ऋषि मुनि काफी विद्वान थे उन्हें मालूम था कि तुलसी असंख्य गुणों वाला पौधा है अतः इसे धर्म से जोड़ दिया तो यह अन्य वनस्पतियों की तरह विलुप्त नहीं होगा। सच भी है यदि इस पौधे को धर्म से न जोड़ा गया होता तो शायद तमाम अन्य वनस्पतियों की तरह यह भी लुप्त हो गया होता अथवा लुप्त होने की कगार पर होता।
तुलसी की जड़, पत्ती, तना, बीज (मंजरी) आदि हर भाग किसी न किसी रोग की औषधि है, आइये एक नजर डालते हैं तुलसी के औषधीय गुणों पर:-
1. प्रातः खाली पेट 2-3 चम्मच तुलसी के रस का सेवन किया जाये तो शारीरिक बल एवं स्मरण शक्ति में वृद्धि के साथ-साथ व्यक्तित्व भी प्रभावशाली बनता है।
2. शरीर के बजन को नियंत्रित करने हेतु भी तुलसी गुणकारी है, इसके नियमित सेवन से भारी व्यक्ति का बजन घटता है एवं दुबले का बढ़ता है।
3. यदि तुलसी की पत्तियों को काली मिर्च के साथ सेवन किया जाये तो मलेरिया एवं मियादी बुखार में आराम मिलता है।
4. चाय बनाते समय कुछ पत्ती तुलसी की डाल दी जाये ंतो सर्दी बुखार एवं मांस पेशियों के दर्द में राहत मिलती है।
5. तुलसी के रस में खड़ी शक्कर मिला कर पीने से सीने के दर्द एवं खांसी में राहत मिलती है।
6. दूषित पानी में तुलसी की कुछ पत्तियां डालने से पानी शुद्ध हो जाता है।
7. पेट में दर्द होने पर तुलसी रस और अदरक रस को समान मात्रा में लेकर दिन भर में तीन चार बार पीने से दर्द का नाश होता है।
8. 10 ग्राम तुलसी के साथ 5 ग्राम शहद एवं 5 ग्राम पिसी काली मिर्च का सेवन किया जाये तो पाचन शक्ति बढ़ती है।
9. चर-पांच भुने हुये लौंग के साथ तुलसी की पत्ती चूसने से सभी प्रकार की खांसी से राहत मिलती है। 
10. तुलसी की पत्तियां चबाने से मुंह से आने वाली दुर्गंध समाप्त होती है।
11. तुलसी के ताजे पत्तों को गर्मकर नमक के साथ खाने से बंद गला खुल जाता है।
12. तुलसी की पत्तियां प्रत्येक सुबह पानी के साथ पीसकर लगाने से एक्जिमा एवं खुजली से राहत मिलती है।
13. तुलसी रस की गरम बंूदें कान में डालने से कान के दर्द में राहत मिलती है।
14. मुंहासों पर तुलसी का लेप करने से मुंहासे समाप्त होते हैं।
15. तुलसी के ताजे रस का सेवन उल्टी को रोकने में काफी कारगर है।

             इस प्रकार इस नन्हे से पौधे का प्रत्येक भाग अत्यंत गुणकारी है।

शनिवार, 18 अगस्त 2012

स्वतंत्रता के मायने

रमजान के महीने का कुरान में पाक माना गया है, इस्लाम धर्म में अच्छा इन्सान बनने के लिए पहले मुसलमान बनना आवश्यक है और मुसलमान बनने के लिए बुनियादी पांच कर्तव्यों :- फराईज़द् का अमल में लाना आवश्यक है। यदि कोई व्यक्ति निम्नलिखित पांच कर्तव्यों में से किसी एक को भी ना माने तो वह मुसलमान नहीं हो सकता :-
ये फराईज हैं.
ईमान यानी कलिमा तय्यब जिसमें अल्लाह के परम पूज्य होने का इकरार उसके एक होने का यकीन और मोहम्मद साहब के आखिरी नबी ;दूत होने का यकीन करना शामिल है। इसके अलावा बाकी चार हैं .नमाज़ रोज़ा हज और ज़कात।
इस्लाम के ये पांचों फराईज़ इन्सान को इन्सान से प्रेम सहानुभूति सहायता तथा हमदर्दी की प्रेरणा देते हैं। यदि कोई व्यक्ति मुसलमान होकर इस सब पर अमल न करे तो वह अपने मजहब के लिए झूठा है।
रोज़े को अरबी में सोम कहते हैं जिसका मतलब है रुकना। रोज़ा यानी तमाम बुराइयों से रुकना या परहेज़ करना। ज़बान से गलत या बुरा नहीं बोलना आंख से गलत नहीं देखना कान से गलत नहीं सुनना हाथ.
पैर तथा शरीर के अन्य हिस्सों से कोई नाजायज़ अमल नहीं करना। रोज़े की हालत में किसी व्यक्ति के लिए यह आज्ञा नहीं है कि वह अपनी पत्नी को भी इस नीयत से देखे कि उसके मन में कामवासना जगे। गैर औरत के बारे में तो ऐसा सोचना ही हराम है।
रोज़े में दिन भर भूखा व प्यासा ही रहा जाता है जिससे इन्सान में एक वक्ती कमज़ोरी आ जाती है और वह किसी भी हैवानी काम के विषय में नहीं सोचता शोर नहीं मचाता हाथापाई नहीं करता इत्यादि। इसी तरह यदि किसी जगह लोग किसी की बुराई कर रहे हैं तो रोज़ेदार के लिए ऐसे स्थान पर खड़ा होना मना है।
जब मुसलमान रोज़ा रखता है भूखा.प्यासा रहता है तो उसके हृदय में भूखे व्यक्ति के लिए हमदर्दी पैदा होती है।
रमज़ान के माह में मुसलमान के हर नेक अमल यानी पुण्य के कामों का सबाव 70 गुना बढ़ा दिया जाता है। 70 गुना अरबी में मुहावरा है जिसका मतलब होता है बेशुमार। इसलिए प्रत्येक व्यक्ति अपने पुण्य के कामों में अधिक से अधिक हिस्सा लेता है।
 रोजा  झूठ हिंसा बुराई रिश्वत तथा अन्य तमाम गलत कामों से बचने की प्रेरणा देता है। इसकी मश्क यानी ;अभ्यास पूरे एक महीना कराया जाता है ताकि इंसान पूरे साल तमाम बुराइयों से बचे और इंसान से हमदर्दी का भाव रखे।
ते यह तो हैं कुरान के अनुसार मुसलमानों की परिभाषा फिर उपद्रव करने वाले कौन हैं, दंगा करने, गाडि़यों में तोड़-फोड़ करने, मारपीट करने, दुकाने लूटने वाले कौन हैं? दरअसल दंगाई न हिंदू होते हैं न मुसलमान दंगाई सिर्फ और सिर्फ दंगाई होते हैं। उनका मकसद् समाजिक सौहार्द को बिगाड़ना और अपना उल्लू सीधा करना होता है। दुकानों में लूट-पाट करते वक्त, महिलाओं के साथ छेड़छाड़ करते वक्त उनका इरादा इस्लाम का भला करना नहीं वरन मौके का फायदा उठाना होता है।
हां हमारी सरकार (चाहे वह केन्द्र की हो राज्य की) को जरूर दंगाइयों के रूप में धर्म की व्याख्या करना बहुत अच्छी तरह आता है, सरकार के लिये पाक कुरआन के अनुसार ऊपर दिये गये गुणों वाला मुसलमान नहीं है न ही वह मुसलमानों का नुमाइंदा है, सरकार को यह दंगाई ही मुसलमानों के सच्चे नुमाइंदे दिखायी देते हैं और उसको लगता है कि यदि इनके खिलाफ कड़ी कार्यवाही की तो उसका वोट बैंक गड़बड़ा जायेगा। समझ में नहीं आता कि सरकार दंगाइयों के ऊपर सख्त कार्यवाही करते वक्त उन्हें धर्म के चश्मे से क्यों देखती है और जब कभी-कभी दूसरे समुदाय के ओर से भी प्रतिक्रिया होती है तो तमाम राजनैतिक दल, तथाकथित मानवाधिकार समर्थक संगठन आसमान सर पर उठा लेते हैं और जब यह उपद्रवी, दंगाई (सरकारी चश्मे से देखने पर मुसलमान) उपद्रव करते हैं तो इनके खिलाफ सख्त कार्यवाही क्यों नहीं की जाती? अगर एक दो शहरों में इस तरह की हरकत करने वालों पर सख्त कार्यवाही हो तो दंगे की आग एक-एक कर दूसरे शहरों को भी अपनी चपेट में क्यों ले? क्यों नहीं इस पर प्रभावी तरीके से रोक लगाई जाती है। डर है कहीं वोट बैंक न खिसक जाये!!! मुस्लिमों पर सरकार ने कार्यवाही कर दी!!!!!!!!!!!!!!! क्यों नहीं समझा जाता कि यह सिर्फ उपद्रवी है और एक सच्चे मुसलमान को इनके प्रति हमदर्दी भी हीं होगी न ही होनी चाहिये और जिन्हें है वह किसी दंगाई से कम नहीं है।
हमारे देश में स्वतंत्रता का मतलब क्या है? जब चाहो, जहां चाहो लूटपाट शुरू कर दो, जहां चाहो सार्वजनिक और निजी सम्पत्ति को नुकसान पहुंचाओ। आखिर लखनऊ के पार्क में तथाकथित मुसलमानों ने जिन महिलाओं के कपड़े फाड़े उनका क्या कसूर था? जिन निर्दोश दुकानदारों की रोजी-रोटी छीनी उनका क्या कसूर था? लेकिन हमारी सरकार है कि उसके लिये यह सब आम घटनायें हैं। उसके लिये खास तब तक नहीं होता जब तक सड़कों पर खून न बहे।
दुनियां में बहुत से देश हैं जहां सभी धर्मों के लोग रहते हैं? मगर क्या किसी देश में किसी धर्म विशेष के लिये ‘‘पर्सनल लाॅ’’ का प्रावधान है???? यह हमारा देश ही है? क्यों ? क्योंकि हमारे देश के राजनैताओं के लिये देशहित से अधिक स्वयं का हित, सत्ता का सुख महत्व रखता है। उनके लिये इसके कोई मायने नहीं कि देश का क्या होगा? उनके लिये यह मायने है कि कहीं हमारी कुर्सी न चली जाये। क्यों नहीं देश में समान नागरिक संहिता लागू की जाती? और अगर धर्म के आधार पर ’’पर्सनल लाॅ’’ की इजाजत है तो बाकी धर्मों के भी पर्सनल लाॅ हो सकते हैं। फिर देश का कानून!!! खूंटी पर टाग दिया जाये ना!!! क्यों कि हर धर्म का अपना अलग कानून होगा। अदालतों में हर धर्म के जजों की नियुक्ति की जाये। बार कौसिंल, वकालत बंद कर दी जाये। मुस्जिदों, मंदिरों, गिरजाघरों में तैयार की जाये ‘‘पर्सनल लाॅ’’ के एडवोकेट।
कितना हास्यापद है इस देश का कानून और इस देश के राजनैतिक दलों का आचरण। शायद इनके लिये स्वतंत्रता के मायने यहीं हैं कि जनता को मरने दो अपनी कुर्सी सुरक्षित रखो।

मंगलवार, 14 अगस्त 2012

अपहरण


‘‘चोरी करो मगर डकैती तो मत करो, अपहरण करो तो करो मगर हत्यायें तो मत करो’’ एक माननीय मंत्री जी के भाषण को हम सभी दोस्त बड़े गौर से एक समाचार चैनल पर सुन रहे। आखिर सभी बेराजगार जो हैं और रोजगार प्राप्त करने के लिये जी तोड़ कोशिष और इंडिया मार्का जुगाड़ फिट करने के बाबजूद कोई आशा की किरण नजर नहीं आती, परिणामस्वरूप सारा समय समाचार सुनने, रोजगार समाचार देखने और नये-नये आइडिया सोचने में ही बीतता है।
मंत्री जी के भाषण ने हमारे एक साथी के मन में जबरदस्त आइडिया सुझाया, ‘‘एक आइडिया है यार’’ चहक कर उसने कहा, कहने का स्टाइल और चेहरे की चमक बता रही थी कि आइडिया जबरदस्त ही होगा।
‘‘अब कौन सा आइडिया है?’’ मैने पूछा।
‘‘देख यार नौकरी मिलती नहीं, और जीने के लिये पैसा तो चाहिये ही सो कुछ करना पड़ेगा ना, और वैसे भी हमारी पुलिस को बिना कुछ खास करे ही पैसे मिलते हीं हैं इसलिये वह कुछ करती नहीं। देखो बैंक तक लुट रहे हैं पर पुलिस कभी किसी बेचारे को पकड़ने की जहमत नहीं उठाती। तो क्यों न हम भी कुछ काम करें‘‘ हमारे साथी ने कहा।
‘‘यार साफ-साफ बोल न कहना क्या चाहता है?’’
‘‘देख हम लोग मिलकर एक ‘‘अपहरण इंडस्ट्री’’ की स्थापना करते हैं, और मंत्री ने तो कहा ही है कि अपहरण कर सकते हो बस हत्या मत करो’’।
‘‘हां यार, आइडिया तो अच्छा है, वैसे भी आजकल शहर में अमीरों की तादात बढ़ रही है, साल में पांच-छह ‘‘केस’’ भी मिल गये तो जिंदगी बिंदास कटेगी’’ हमारे एक और साथी ने भी समर्थन किया।
मुझे भी लगा बात में दम हैं, सो अपहरण इंडस्ट्री के प्रस्ताव को सर्वसम्मति से पास कर दिया गया। बस अब खोज थी तो हमारे पहले अतिथि की।
काफी सोच-विचार के बाद मुझे याद आया कि हमारे शहर के बिरजू सेठ का इकलौता लड़का बंटी ही हमारे लिये सबसे सरल और फायदेमंद शिकार हो सकता है। बिरजू सेठ का लड़का अपनी बैट्री से चलने वाली बाइक से रोज स्कूल जाता था। मैं तो उसे अच्छे से जानता था मगर हमारे साथी उसे नहीं पहचानते थे, अतः मैने उन्हें उसकी बैट्री वाली साइकिल का पूरा विवरण देकर समझा दिया। हमने अपने दिमाग के घोड़ों के साथ गधों को भी दौड़ाया और इस नतीजे पर पहुंचे कि यदि बंटी का अपहरण सफलतापूवर्क होता है तो हमारी अपरहण इंडस्ट्री की धमाकेदार शुरूआत होगी और कम से एक करोड़ की वसूली तो आसानी से हो ही जायेगी।
बस फिर क्या था, हमने आनन-फानन में अपनी योजना अपने वफदार तेज-तर्रार सार्थियों को समझा दी। हमारे साथियों ने अपने प्लान पर तेजी से अमल किया और उसी दिन स्कूल से वापस आते समय बंटी का अपहरण कर लिया। हमने अपने साथियों के माध्यम से बंटी के घर एक ‘‘आडियो केसेट‘‘ में यह संदेश रिकार्ड करके भिजवा दिया कि यदि अपने लड़के को जीवित वापस चाहते हो तो एक करोड़ रूपया एक सप्ताह के अंदर हमारे दिये गये ठिकाने पर पहंुचा दो। हमने अपने ठिकाने का पूरा विवरण और वहां पहुंचने वाले आदमी के बारे में पूरा विवरण भी कैसेट में रिकार्ड करवा दिया था। हमें पूरा विश्वास था कि हमारी योजना के अनुसार अपने इकलौते बेटे को बचाने के लिये बिरजू सेठ हमें बड़ी आसानी से एक करोड़ रुपये दे देगा।
निश्चित तारीख को नियत किये गये ठिकाने पर हमने अपने सबसे विश्वसनीय साथी को भेज दिया। लगभग एक घंटे बाद वह खाली हाथ लौट आया, हां उसके हाथ में एक लिफाफा जरूर था। हमने मन ही मन सोचा कि शायद बिरजू सेठ ने हमें बेयरर चेक से भुगतान किया है।
‘‘भाई वहां बिरजू सेठ तो नहीं आया, कोई आदमी यह लिफाफा दे गया है’’ साथी ने लिफाफा मेरी ओर बढ़ाते हुये कहा।
मैने लिफाफा लेकर खोला तो उसमें एक पत्र निकला, मैने उसे पढ़ना शुरू किया,
‘‘प्रिय भाई,
सदर नमस्कार।
आपको बहुत-बहुत धन्यवाद, जो आपने मेरे लड़के का अपहरण कर लिया। मगर मुझे शिकायत इस बात की है कि आपने मेरे एक ही लड़के का अपहरण क्यों किया। कृपा करके कम से कम मेरे दो और लड़कों का अपहरण कर ले जायें और हां, और आपने कहा कि मैं लड़का वापस पाने के लिये आपको एक करोड़ रुपये दूं, तो इस बारे में कान-नाक खोलकर सुन लीजिये कि मैं आपको एक करोड़ तो क्या एक कौड़ी भी नहीं दूंगा और हां यदि आपने मेरे लड़के को वापस करने की कोशिष की तो राधे कसम पुलिस में शिकायत जरूर कर दूंगा।
अतः आपकी भलाई इसी में है कि उस लड़के को तो अपने पास रखो ही कम से कम दो लड़कों को और पकड़ ले जाओ, क्यों मैं अपने एक दर्जन लड़कों की इस फौज को खिलाने पिलाने में असमर्थ हूं। एक लड़के को अपने पास रखने के लिये बहुत-बहुत धन्यवाद, कृप्या भूलकर भी उसे वापस भेजने की हिम्मत मत करना वर्ना मैं पुलिस में रिर्पोट कर दूंगा।
आपका विश्वसनीय
   छेनू लाला उर्फ जलेबी वाला  
‘‘अबे गधों किसके लड़के का अपहरण करके लाये हो तुम लोग?’’ पत्र पढ़कर मैं चीखा।
‘‘अरे आपने जिसका बताया था उसीका तो अपहरण किया है हमने, यह देखिये हम तो साइकिल भी साथ लाये थे‘’।
‘‘फिर यह छेनू लाला-जलेबी वाला कौन है?’’
‘‘यह तो हमंे खुद नहीं पता’’।
हम सभी बुरी तरह झंुझला रहे थे, तभी हमारे एक साथी ने कमरे में प्रवेश किया और कहा, ‘‘मर गये यार, उस दिन बिरजू सेठ ने स्कूल से वापस आते समय अपनी साइकिल अपने दोस्त यानी कि छेनू लाला के बेटे को दे दी थी, और उसके बेटे का नाम भी बंटी ही है।‘‘ उसने रहस्योद्घाटन किया।
हमने अपना सर पीट लिया। इधर वह लड़का हमारी नाक में दम किये था। अपने घर जाने के लिये तो उसने एक बार भी नहीं कहा, हां कभी हमसे रसगुल्ले मांगता, कभी जलेबी तो कभी चाॅकलेट। न दो तो बुरी तरह चीख-चीख कर रोने लगता। वह तो हमसे ऐसे जिद करता मानो हम ही उसके बाप हों। अब हम सब के सब परेशान थे। एक तो बेरोजगारी ऊपर से इस मुसीबत का खर्च। दोष तो बेचारे साथियों का भी नहीं था, उन्होंने तो साइकिल की पहचान और लड़के का नाम सब मिला लिया था, पर हमारा नसीब ही खराब था सो सब काम खराब हो गया और जब कैसेट भेजा तो वह भी पता नहीं कैसे छेनू लाला को मिल गया।
खैर! जो हुआ सो हुआ। मगर अब समस्या यह थी कि उस लड़के को वापस करने पर छेनू लाला पुलिस को सूचना देने की धमकी दी थी। इधर उस लड़के को खिलाते-खिलाते हमारी हालत पतली हो रही थी। जितना हम सब मिलकर खाते थो उतना वह अकेले खा जाता था। उससे बुरी तरह परेशान हो हमने उसे उसके बाप के घर  छोड़ आने का निश्चय कर लिया। मगर वह लड़का अपने घर जाने को तैयार ही नहीं था।
जैसे-तैसे एक प्लान सोचा और उससे कहा कि चल बेटा तुझे बाहर घुमाने ले चलते हैं। खुशी-खुशी वह हमारे साथ घूमने के लिये निकल पड़ा। हमने उसके घर के जनदीक पहुंचकर हमने उसे आइसक्रीम दिलवायी, चाॅकलेट भी दिलवाई। वह मस्त होकर आइसक्रीम खाने लगा और हम अच्छा मौका देख उसे वहीं छोड़ सरपट भागने लगे। मगर किस्मत! उसने हमें भागते हुये देख लिया। आइसक्रीम फेंक उसने भी हमारे पीछे भागना प्रारम्भ कर दिया। वह तेजी से अंकल-अंकल चिल्लाता जा रहा था, और भागता जा रहा था। उसे भागते देख हमारी गति स्वतः ही दोगुनी हो गई।
बड़ी मुश्किल से उस लड़के से पीछा छुड़ाकर हम वापस आये। कान पकड़कर बैठकें लगायीं, नाक पकड़कर खींची और इसी के साथ हमारा ‘‘अपहरण इंडस्ट्री’’ का धंधा शुरू होने से पहले ही बंद हो गया। मगर बेरोजगार हैं सो कुछ ना कुछ आइडिया सोचना तो पड़ता ही है, अगर आपके पास कोई आइडिया हो तो जरूर बताना, मगर अक्ल के घोड़े ही दौड़ाना, गधों को कसकर बांध देना ताकि घोड़ों के साथ वह भी न दौड़ पड़ें।

मंगलवार, 13 मार्च 2012

मुर्दों का दर्द


अखबार में खबर पढ़कर जाग गया

जब देखा कि एक मुर्दा चीड़घर से भाग गया

ढ़ूड़कर लाने वाले को ईनाम मिलेगा

यदि बेरोजगार हुआ तो चीड़घर में ही काम मिलेगा

प्हचान कुछ इस प्रकार लिखी थी -

उसका ब्लेक एण्ड व्हाइट

मगर दाड़ी मूंछ रंगीन है

और हेयर स्टाइल बिल्कुल नवीन है

एकदम गठीला बदन है

शरीर पर टेरीकाट का कफन है

दौड़ नहीं सकता एक टांग टूटी है

दिखाई भी कम देता है एक आंख फूटी है

ढूड़कर लाइये आप भी किस्मत आजमाइये

यह सिलसिला शाम तक चला

मगर वह मुर्दा नहीं मिला

अचानक सोचा चलो कब्रिस्तान देख लेते हैं

एक बार फिर, किस्मत का पासा फेंक लेते हैं

टार्च लेकर रात 10 बजे कब्रिस्तान आया

वहां पर रोशनी देखकर सर चकराया

बड़ा आश्चर्यजनक हाल था

सामने सजा सुन्दर पण्डाल था

बड़ी संख्या में मुर्दे विराजमान थे

कुछ मरियाल और कुछ नौजवान थे

छिपकर देखा भाषण चल रहे थे

कुछ मुर्दे आस-पास टहल रहे थे

एक ने मुझे देखा और बोला पत्रकार साहब अन्दर आइये

अपने अखबार में एक-एक बात फोटो सहित निकलवाइये

मैं घबरा रहा था, किन्तु हिम्मत बना रहा था

कागज पेन निकालकर सभा में खो गया

उनका उसी समय भाषण शुरू हो गया

सर्वप्रथम स्व0 अमरलाल जी आये

अपनी बदकिस्मती पर दो आंसू बहाये

बोले हमारा पुत्र कहता है कि पिताजी स्वर्ग में खड़े हैं

किन्तु उस नालायक को क्या पता स्वर्ग में भीड़ है

इसलिये हम वेटिंग लिस्ट में पड़े है

खैर हमारा विषय है कब्रिस्तान में बढ़ती हुई जनसंख्या

और पर्यावरण प्रदूषण -इसके कारण

और मानव द्वारा मुर्दों का शोषण

बड़ी संख्या में जनता मर रही है

हमारे आस-पास की सारी जमीन भर रही है

बम फटा तो हमारी मुसीबत हुई

सैकड़ों यहां भिजवा दिये

धर्म के नाम पर गोलियां चलीं

हजारों यहां पहुंचा दिये

कौन जाने हम मुर्दे कैसे रहते हैं

प्रदूषण और गंदगी कैसे सहते हैं

मैं प्रधानमंत्री जी को एक पत्र पहुंचाउंगा

उन्हें यहां के हालात से अवगत कराउंगा

आखिर हम मुर्दों को भी जीने का हक है

इससे तो अच्छा हमारा नरक है

कहेंगे महोदय कृप्या मरने पर अंकुश लगाइये

अन्यथा कुछ नये कब्रिस्तान बनवाइये

हमें आपसे बहुत बड़ी शिकायत है

हमारे यहां बीमार मुर्दों की बहुतायत है

जो रात भर खंासते खखारते हैं सोने नहीं देते

नहाना तो दूर हाथ तक नहीं धोते

जो बीमारी में आते हैं

हमारे बीच रोग फैलाते हैं

जो साहित्यकार आते हैं

हम सबका दिमाग चाटकर पागल बनाते हैं

आपसे अनुरोध है कि शीघ्र ही इलाज हेतु

एक डाॅक्टर मारकर पहुंचा दें

क्ृप्या हमारे कष्टों पर विचार करे

और हम मुर्दों का उद्धार करें

भविष्य में जो भी मुर्दा भिजवायें बीमार और बूढ़े नहीं

स्वस्थ और नौजवान भिजवायें

अन्यथा हम सब मिलकर

स्वर्ग का बहिस्कार कर नर्क में चलें जायेंगे

और फिर आपके पुरखे नर्कवासी कहलायें।

मैं भाषण सुनकर भाग आया

उस मुर्दे को नहीं खोज पाया

किन्तु यह समाचार आप तक पहुंचा रहा हूं

और अब स्वर्ग से सीधे नर्क में जा रहा हं।

मंगलवार, 11 अक्टूबर 2011

मोती


        मोती! बस यह शब्द कानों में पड़ते ही उस नन्हें से जीव की स्मृति ताजी हो जाती है जो कभी मुझे अपने एक दोस्त की तरह लगता था। उस समय मैं अपने पिताजी के साथ फर्रुखाबाद में रह रहा था, मेरी माँ, दादी और बहन जिला मैनपुरी के अन्तर्गत आने वाले गांव नौनेर में रह रहीं थीं। चूंकि मैं अपनी मां से दूर था, इसलिये मां का प्यार भी पिता से पाता था। उस समय मैं कक्षा चार में पढ़ रहा था, हम इस शहर में किराये के मकान में रहते थे, चूंकि हम दूसरी मंजिल पर रहते थे और छत पर हमारे सिवा और दूसरा कोई नहीं रहता था, अतः पिताजी ऑफिस जाते समय कमरे में ताला डाल देते थे, ताकि मैं कहीं खेलने चला जाऊं तो कमरा खुला न रहे और मैं अक्सर छत पर या बरामदे में बैठा रहता था।
चूंकि उस मकान में एक जामुन का पेड़ था अतः छत पर भी उसकी काफी छाया फैली रहती थी, अतः मैं ज्यादातर उसकी छाया में बैठकर पढ़ा करता। पिताजी मेरे लिये काफी सारी बाल पत्रिकायें ला देते थे, मैं ज्यादातर समय उन्हीं में उलझा रहता, मगर फिर भी कभी-कभी मेरा मन पत्रिकाओं से ऊब जाता था।
एक दिन पिताजी के साथ मैं उनके दोस्त गुप्ता जी के यहां गया। वहीं मुझे दिखा वह नन्हा सा जीव। मुझे लगा यह मेरा ऐसा दोस्त बन सकता है तो मेरे साथ रहकर मेरे अकेलेपन को दूर कर सके। वह एक सफेद चूहा था, गुप्ता जी के यहां दो चूहे पले हुये थे, उन्होंने बताया कि इनको यदि पिंजड़े से बाहर निकाल दो तब भी यह कहीं नहीं जाते। उन चूहों में से एक नाम हीरा था और दूसरे का मोती।
मैने पिताजी को अपने मन की बात बताई कि मैं इन चूहों में से एक को पालना चाहता हूँ। पिताजी पहले तो मना किया मगर मेरे जिद करने पर उन्हांेने मुझे आज्ञा दे दी, बस फिर क्या था मैं मोती नाम का एक सफेद चूहा घर ले आया। उसके लिये मैने एक पिंजरा खरीदा और विशेष रूप से पालतू सफेद चूहों के लिये बाजार में बिकने वाले छोटे-छोटे बिस्किट भी। मोती को यह बिस्किट बहुत पंसद थे।
अब तो मैं जब भी घर पर होता तो मोती को पिंजरे से निकाल कर अपने पास ही रखता और भी बिस्किट के लालच में मेरे पीछे-पीछे पूरी छत पर घूमा करता। जब मैं पढ़ने बैठता तो वह आकर मेरी किताब पर आ बैठता और तक तब न हटता जब तक उसे बिस्किट न मिलें। स्कूल जाते समय मैं मोती को पिंजरे में बंद कर देता था, और मेरे वापस आते ही मोती पिंजरे में चीं-चीं की करके बाहर निकालने को कहता। पिंजरे से बाहर निकलते ही वह मेरे आस-पास उछलकूद मचाना शुरू कर देता।
कभी-कभी ज बवह ज्यादा शरारत करता तो मैं उसे उठाकर अपनी पेंट की जेब में रख लेता और वह भी किसी बेजान वस्तु की तरह चुपचाप जेब में पड़ा रहता। अब पापा भी मोती के लिये मंूगफली, बिस्क्टि आदि अक्सर ले आते थे। सुबह के समय जब मैं सोकर जल्दी न उठता तो पिताजी मोती का पिंजरा खोल देते थे, और पिंजरे से बाहर आते ही मोती मेरे सिर से पैर तक दौड़ लगाना शुरू कर देता, मुझे तेजी से गुदगुदी होती और मजबूरन मुझे उठकर बैठना पड़ता।
एक दिन तो मोती ने हद ही कर दी। उस दिन सुबह से हल्की बारिश हो रही थी। बारिश के डर से मैने पूरा बैग ले जाने की बजाय कुछ कॉपी किताबें ही बैंक में रख लीं और स्कूल के लिये निकल गया। मगर स्कूल पहुंचकर मुझे पता चला कि गणित वाली शीला मैडम आज आ गई हैं, जबकि कल तक वह छुट्टी पर थीं। मुझे तो यही पता था कि मैडम आज नहीं आयेंगीं सो मैं गणित की कॉपी लेकर ही नहीं आया था। शीला मैडम के नाम से ही सभी बच्चे थर-थर कांपते थे। शीला मैडम आज कॉपी चेक करेंगीं और मैं तो कॉपी लाया नहीं, आज तो मेरा बैंड बजना तय है यह सोचकर मैं बेहद परेशान था। 
मैथ के पीरियड में शीला मैडम ने क्लास में प्रवेश किया। अभिवादन स्वीकार करने के बाद उन्होंने सभी छात्रों को बैठने का इशारा किया। मगर स्वयं नहीं बैठीं। हम जानते थे उनकी इस आदत को कि वह आते ही पढ़ाना शुरू कर देतीं हैं। उन्हांेने सभी छात्रों की ओर एक पैनी नजर डाली और गणित की कॉपी निकालने का आदेश दिया। मेरे चेहरे पर घबराहट के निशान साफ दिख रहे थे, शायद इसीलिये मैडम सीधी मेरी डेस्क के पास ही आकर खड़ीं हो गईं। ‘‘कॉपी क्यों नहीं निकालते?’’ मैडम ने कहा।
‘‘भूल आया मैम’’ मैने घिघियाते हुये जबाब दिया।
‘‘भूल आये! इस बैग में क्या भूसा भर रखा है?’’ मैडम ने मेरा बैग झकझोरते हुये उठाया और खोला मगर यह क्या! बैग खोलते ही मैडम एकदम स्पिंग की तरह उछलकर दूर जा खड़ीं हुईं। मेरा बैग उन्हांेने वहीं फेंक दिया।
‘‘क्या हुआ मैडम?’’ सभी छात्रों ने एक स्वर में पूछा।
मैडम के पसीना निकल आया था, गुस्से से तमतमाती हुई बोलीं, ‘‘अभी बतातीं हूं इस नालायक को, बैग में चूहे रखकर लाता है। क्या समझता है तू मैं चूहों से डरती हूँ क्या? चल यह बैग बंद करके उधर रख।‘‘ मैडम ने मुझे आज्ञा दी।
अब मेरी समझ में आया कि मैडक क्यों उछल गईं थीं। दरअसल मेरे बैंग में मोती छुप कर बैठा हुआ था। मुझे मोती की इस शरारत पर बहुत गुस्सा आया। मैडम की आज्ञा मान मैने बैग एक तरफ रख दिया।
‘‘बैंच पर खडे़ हो जाओ और हाथ ऊपर कर लो‘‘ मैडम ने मुझे सजा सुना दी। 
मैं चुपचाप बैंच पर हाथ ऊपर करके खड़ा हो गया। सभी छात्र मुुंह छुपाये हंस रहे थे। मैं नहीं जानता मेरी दशा पर या फिर मैडम के चूहे से डरने के कारण। मैं तो बस इतना जानता हूं कि मोती के चक्कर में मुझे उस दिन पूरे आधा घंटे बैंच पर खडे़ रहना पड़ा।
उस दिन मैं जैसे ही घर आया और बैग रखा मोती भागकर अपने आप पिंजड़े में जाकर बैठ गया, मैने भी आज उसे कुछ खाने को नहीं दिया और न ही मोती ने आज रोज की तरह चीं-चीं की आवाज करके खाना मांगा। शायद उसे भी अपनी भूल का अहसास हो गया था। कुछ ही दूर में मेरा गुस्सा शांत हो गया, मैने मोती को बाहर निकाला, बिस्किट खिलाये और छत पर घूमने के लिये छोड़ दिया।
मोती को मेरे घर आये एक माह हो गया था, अब मेरा समय उसके साथ बड़े मजे से कटता था। कल मम्मी भी गांव से आ गईं थीं क्यों कि पापा की तबियत कुछ गड़बड़ थी। उन्हें ठीक हुये अभी दो-चार दिन ही हुये होंगे कि एक दिन वह स्कूटर से कहीं जा रहे थे कि अचानक स्कूटर के फिसल जाने से उनके पैर में चोट लग गई, चोट ज्यादा नहीं थी सो दो-चार दिन में ठीक हो गई।
मगर न जाने क्या हो रहा था एक सप्ताह बाद ही मम्मी का पर्स कहीं खो गया, जिसमें पूरे पांच हजार रुपये थे। इस घटना के दो-तीन दिन बाद मेरी भी तबियत कुछ गड़बड़ हो गई। मेरा इलाज हुआ और मैं भी ठीक हो गया। मगर मेरी मम्मी ने अपने धार्मिक और अंधविश्वासी स्वभाव के चलते इन सब घटनाओं का कारण मोती को ठहराया और एलान कर दिया कि चूहा घर में पालना शुभ नहीं होता, अतः मोती अब यहां नहीं रहेगा।
अब भला मम्मी को कौन समझाये? मैं पापा से ही रोया गिड़गिड़ाया। पापा ने मम्मी को समझाया कि चूहा पालना अशुभ नहीं होता है, यह सब तो अंधविश्वास है। मगर मम्मी ने अपने आगे पापा की एक न सुनी और आखिर पापा ने भी कह दिया कि फुर्सत मिलते ही मोती को गुप्ता जी के यहां छोड़ आयेंगे।
अब मैं जब भी मोती की चीं-चीं सुनता अनायास ही मेरी आंखों से आंसू आ जाते। यही सोचकर कि न जाने किस दिन पापा मोती को छोड़ आयेंगे। कितनी आत्मीयता हो गई मुझे उस नन्हें से प्राणी से यह मेरे आसूं बताते थे। अब मोती भी न जाने क्या पहले जितनी शरारतें नहीं करता था। शायद उसे भी कुछ अहसास हो गया था। कल रविवार का दिन था, मुझे मालूम था कि कल पापा मोती को छोड़ने जायेंगे। शनिवार होने के कारण आज स्कूल में हाफ डे हो गया था। घर आकर मैने देखा मोती छत पर घूम रहा है, शायद स्कूल जाते वक्त मैं उसे पिंजड़े में बंद करना भूल गया था। मुझे देखकर मोती मेरे पास आ गया मैने उसके बिस्किट खिलाये और कुछ देर उसके साथ खेलता रहा। उसके बाद मैं खाना खाने चला गया, और खाना खाने के बाद छत पर बैठकर होमवर्क करने लगा, मोती वहीं छत पर इधर-उधर उछल-कूद करता रहा।
होम वर्क करने के बाद मैने मोती को बुलाया, मगर मोती नहीं मिला। कमरा, घर और पूरी छत छान मारी मगर मोती कहीं नहीं मिला। पापा के ऑफिस से आते ही मैने उन्हें भी मोती के खोने के बारे में बताया, मेरा रूंआसा चेहरा देखकर पापा के साथ-साथ मम्मी ने भी मोती को काफी देर खोजा। मगर अफसोस! मोती नहीं मिला, कभी नहीं मिला। 

बुधवार, 20 जुलाई 2011

कैसे रहें खुश?

             खुश रहने के लिये क्या आवश्यक है? पैसा! आज के युग में ज्यादातर लोग इस प्रश्न के उत्तर में यही कहेंगे। कुछ लोग प्रेम में भी खुशी तलाशते हैं। कुछ लोग ऐसे भी हैं जो कि रिश्तों में खुशी को पाना चाहते हैं। अलग-अलग लोगों की अलग-अलग विचारधारा है पर ये निश्चित है कि खुशी की तलाश सभी को है। सभी खुश रहना चाहते हैं, पर खुश रहें कैसे? यह प्रश्न हर उस व्यक्ति के सामने आता है जो जीवन की समस्याओं से दुःखी है और इनसे मुक्ति पाकर प्रसन्न रहना चाहता है, खुश रहना चाहता है। कल्पना कीजिये एक ऐसे व्यक्ति की जो हमेशा खुश रहता है, जिसके मस्तिष्क में किसी प्रकार की कोई चिन्ता नहीं है। यकीनन वह दुनियां का सबसे भाग्यशाली इंसान होगा।
हर व्यक्ति खुशी तलाशता है कोई पैसे में, कोई प्यार में पर यदि आप सोचते हैं कि ढेर सारा पैसा मिल जाने से कोई प्रसन्न रह सकता है तो यह एक भ्रम ही है। यदि पैसा खुशी दे सकता तो दुनिया के सारे अमीर लोग बहुत प्रसन्न रहते। पैसा होते हुये भी उन्हें ढेर सारी चिन्तायें घेरे रहतीं हैं, कहां रह पाते हैं वह खुश? न जाने कितना रूपया तो वह प्रसन्न रहने की कोशिष में खर्च कर देते हैं, पर याद रहे खुशी पैसे से खरीदी जाने वाली चीज नहीं है। खुशी तो हर इंसान के अंदर है बस उसे खोजने की आवश्यकता है। हाँ यदि आपको जीवन की मूलभूत आवश्यकताओं के लिये भी संघर्ष करना पड़ता है तक तो पैसा आपकी प्राथमिकता में अवश्य ही होगा।
एक शहर में एक आदमी रहता था, वह काफी अमीर था उसके घर से कुछ ही दूर एक किसान रहता था। अमीर आदमी के यहां कई नौकर-चाकर थे। हर चीज उसके पास उपलब्ध थी। फिर भी वह खुश नहीं रह पाता था। कभी व्यापार की चिन्ता, कभी बेटों की चिन्ता, कभी स्वास्थ्य की चिन्ता न जाने उस अमीर आदमी ने खुशी पाने की खातिर कितना रूपया बर्बाद किया, मगर उसे खुशी फिर भी नहीं मिली। एक बार वह अपनी कार से कहीं जाने के लिये निकला कि अचानक उसकी कार एक गांव में एक गरीब किसान के दरवाजे के सामने पहुंच कर खराब हो गई। अमीर आदमी ने अपने ड्राइवर को दूसरी कार लाने भेज दिया और तब तक स्वयं उस किसान के घास-फूस के छप्पर में जाकर बैठ गया। किसान उस समय लेटा था। उस अमीर आदमी को देखकर किसान ने उठकर उसे आदरपूर्वक घड़े का ठन्डा पानी पिलाया, पानी पीकर अमीर आदमी ने किसान से कहा, ‘‘भैया, तुम खेती छोड़कर कोई दूसरा कार्य क्यों नहीं करते, ताकि ज्यादा कमाई हो सके?‘‘
‘‘उससे क्या होगा सेठ जी?’’
‘‘क्या होगा! अरे तुम्हारे पास पैसा होगा तो तुम खुश रहोगे‘‘। सेठ जी ने कहा।
‘‘सेठ जी, क्या आप खुश हैं? आपके पास तो बहुत सारा पैसा है! सारी सुख-सुविधायें है? रही बात मेरी सो मैं तो अभी ही बहुत खुश हूँ‘‘। किसान ने नम्रता पूर्वक अमीर आदमी से कहा।
किसान की बात सुनकर अमीर आदमी चुप रह गया, किसान तो बिना पैसे के ही बहुत खुश है। यदि वह पैसे की चिन्ता शुरू कर दे तो शायद उसकी खुशी उससे दूर हो जायेगी। रह जायेगा तनाव, भागदौड़ और चिन्ता। वास्तव में प्रसन्नता तो हमारे अंदर ही है, बस उसे पहचानने की जरूरत है इसी संदर्भ में एक प्रचलित कहानी है कि एक लड़का इसलिये दुःखी था कि उसके पास जूते नहीं था, मगर उसकी सोच और दुःख उस समय एकदम खत्म हो गया जब उसने एक ऐसे लड़के को देखा जिसके पैर ही नहीं थे। कुल मिलाकर हर व्यक्ति खुश रहने की कला को अपना सकता है, चाहे वह अमीर हो अथवा गरीब। आइये खुश रहने की इस कला को हम जाने, समझें और सदा खुश रहें:-

मुस्कराते रहे:- खुश रहने की पहली सीढ़ी है कि आप हमेशा मुस्कराते रहें। मुस्कराने की यह आदत आपको आपके अंदर से बाहर ले आती है, मुस्कराने की इस कला के कारण बहुत से घाव शीघ्र भर जाते हैं। मुस्कराकर देखिये, आपकी जिन्दगी अपने आप मुस्कराने लगेगी।

नियमित व्यायाम करें:- नियमित व्यायाम व्यक्ति को आनन्ददायक अहसास से भर देता है। व्यायाम न केवल शारीरिक रूप से व्यक्ति को चुस्त-दुरुस्त रखता है बल्कि इससे मानसिक रूप से भी आदमी संतुष्ट रहता है। प्रातः थोड़ी देर के लिये कहीं हरी-भरी जगह पर टहलने निकल जाये। प्रकृति का साथ और सुबह का मनमोहक वातावरण पाकर मन खुशी से झूम उठता है।

पॉजिटिव सोचें:- मदर टेरेसा ने कहा था कि आज के समय में कोढ़ भी उतनी भयंकर बीमारी नहीं जितनी कि लोगों में अपने आपको गैर जरूरी समझने की बढ़ती सोच है। मुझे क्या? मेरी कौन सुनता है? मुझसे किसी को कोई मतलब ही नहीं‘‘। जैसे विचार आपके साथ-साथ परिवार के अन्य लोगों की खुशी में भी बाधक बनते हैं। अपने मस्तिष्क में निगेटिव विचारों को जगह न बनाने दें। हमेशा सकारात्मक सोचें। अपने लिये कुछ समय खाली बचाकर रखें, जब आप स्वयं अपने प्रभाव में आ जाते हैं तो आपको जीने का उद्देश्य प्राप्त हो जाता है और फिर आप सब-कुछ करने के लिये स्वतंत्र हो जाते हैं, खुलेपन और स्वतंत्रता का यह अहसास व्यक्ति को खुशी से भर देता है।

छोटी-छोटी चीजों में खुशी तलाशे:- अपने जीवन की उन छोटी-छोटी चीजों को पहचाने जो आपको खुशी देतीं हैं। जैसे सूरज को उगते हुये देखना, पंक्षियों की चहचहाट सुनना, सुबह-सुबह घास पर नंगे पैर चलना। इन सबके लिये जरूर वक्त निकालें क्यों कि खुशियां जीवन का हर पल प्रसन्नता से जीने पर निर्भर करतीं हैं।

खुशमिजाज लोगों से मिलें:- दरअसल जीवन में कई तरह के लोगों से वास्ता पड़ता है। कुछ लोग ऐसे भी होते हैं जो स्वयं तो कुछ नहीं ही करते हैं, और आपको भी हर कार्य के लिये आलोचनाओं से घेरे रहते हैं, इसलिये जरूरी है कि ऐसे लोगांे से मिलना जुलना हो सके तो बंद अथवा कम कर दें जो कि आपकी जिन्दगी को दुःखद बना देते हैं। केवल सकारात्मक सोच वाले लोगों को ही अपने संपर्क के दायरे में आने दें, क्यों कि ऐसे लोग दुःख के क्षणों में भी खुश रहना जानते हैं।

प्यार करें:- प्यार शब्द ही कितना मधुर है। प्यार करें से मतलब सिर्फ इतना ही नहीं है कि लड़का-लड़की ही एक दूसरे को प्यार करें। प्यार के तो कई रूप हैं, मां-बाप, भाई-बहन, दोस्तों का प्यार, पालतू जानवरों से प्यार आदि प्यार के अनेकों रूप हैं। आप जिसे प्यार करेंगे, वह भी आपको प्यार करेगा ही और इस प्रकार आपको खुशियों की अनोखी अनुभूति होगी। हां सबसे पहले अपने आप से प्यार करना कतई न भूलें।

रिश्तों में भी है खुशी:- इंसान जब-धरती पर आता है तो अकेला आता है। जैसे-जैसे वह बड़ा होता जाता है अनके रिश्ते जुड़ते चले जाते हैं। युवा होते-होते रिश्तों की एक लम्बी कतार खड़ी हो जाती है। जाने कितने रिश्ते बन जाते हैं और रिश्ते बनने का यह सिलसिला अनवरत चलता ही रहता है। जब रक्षा बंधन पर भाई बहन से मिलने आता है तो बहन खुशी से झूम उठती है, परदेश गया बेटा जब वापस आता है तो मां-बाप प्रसन्न हो जाते हैं, रिश्तों में असीमित खुशी है बस उसे महसूस करने की जरूरत है।

‘‘हर आरजू है छोटी और जिन्दगी बड़ी है।
वो सामने नजर के देखो खुशी खड़ी है।
आवाज दो बुला लो।।